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उत्तर प्रदेश के चुनावी महायुद्ध में तिलक,तराज़ू व तलवार की लुप्त होती प्रासंगिकता !

suryapratap-150x150-1Surya Pratap Singh Ias

उ.प्र. में सवर्ण जातियाँ-ब्राह्मण,ठाकुर आदि की प्रासंगिकता राजनीतिक हाँसिए पर है….जूता तिलक पर पड़े या तलवार पर या फिर उछाला जाए केजरीवाल जैसे नेताओं पर परंतु जूते को हेय दृष्टि से देखना उचित नहीं क्योंकि इसकी अपनी उपयोगिता है। और कभी कभी यह टकरा कर उलटा मारने वाले के ऊपर आकर भी लग जाता है……..इसका अर्थ समझने वाले समझ जाएँगे I
अम्बेडकर ने ‘ब्राह्मणवादी जादिवाद’ का विरोध किया था। ब्राह्मणवादी जातियों में सभी सवर्ण जातियों को सम्मिलित किया गया था जिन्हें शोषक व पूँजीवादी व्यवस्था का अंग माना था। आज की प्रतिनिधिक राजनीति ने जातियों के मध्य प्रतिस्पर्धा को इस तरह बढ़ा दिया कि आज उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पूरी राजनीति असल में विकास या राष्ट्रहित के लिए नही अपितु जातिगत समेकन का प्रतीक बनकर रह गयी है।
औपनिवेशिक भारत में अंग्रेज़ शासकों ने जातियों को भारतीय समाज से कुरीतियों को मिटाने के साथ साथ ‘विभाजित करो और राज्य करो’ के लिए दुरुपयोग किया और जातिवाद को horizontal division की नीव डालकर आधुनिक रूप देने का प्रयास किया।
आधुनिक भारत में अम्बेडकर ने ब्राह्मणवादी जातिगत व्यवस्था का बहिष्कार कर उखाड़ फेंकने का अवाहन किया। 20 जुलाई 1924 को बाबासाहेब अंबेडकर ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना बम्बई में की और ‘शिक्षित हो, आंदोलन करो, संगठित रहो” नारा दिया था। कांशीराम व मायावती जैसे दलित नेताओं ने इस कान्सेप्ट को राजनीतिक संवर्धन के लिए इस्तेमाल किया। अर्थात ब्राह्मणवादी जातियों को शोषक़ भी माना और सवर्णों का राजनीतिक इस्तेमाल कर मूर्ख बनाने को भी उचित माना।
kansiramमंडल आयोग के उपरांत पिछड़ी जातियों के empowerment के रूप का राजनीतिक अपभ्रंश लालू व मुलायम निकल के सामने आए जिन्होंने पिछली जातियों का सकल विकास की न सोचकर अपने परिवार व जाति विशेष के लाभ को प्राथमिकता दी और पिछड़ों का उल्लू बनाया। जबकि उत्तर प्रदेश में उनकी अपनी जाति यानि यादव जाति केवल ७% है।
भारतीय जनता पार्टी जो सवर्ण आधारित पार्टी के रूप में सामने आयी थी ने भी आज के मोदी युग में सत्ता पाने को प्रथम उद्देश्य मान पिछड़ों को संजोने की नीति बनायी है क्यों कि संख्याबल व जातिगत राजनीतिक गणित, चुनाव जीतता भाजपा की भी विवशता है। उत्तर प्रदेश में ४०% पिछड़े, २०% सवर्ण, २१.५% दलित व १८.५% मुसलमान हैं। चुनाव का इतिहास है कि न सभी पिछड़े और न सभी अगड़े एक साथ नहीं कभी रहे और हमेशा विभाजित होकर किसी न किसी पार्टी को मत दिया।
मुसलमान व दलित एक जुट होकर मतदान करते रहे हैं। मैं किसी जातिवाद की बात नहीं कर रहा हूँ अपितु मंडल आयोग व कांशीराम के बाद के राजनीतिक-युग में अगड़ों की उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में राजनीतिक अप्रासंगिकता की बात कर रहा हूँ। कल्याण सिंह, मुलायम सिंह, अखिलेश व मायावती के बाद अब आने वाले समय में शायद ही कभी उत्तर प्रदेश में कभी सवर्ण मुख्यमंत्री बने।
आज २०% सवर्ण जातियाँ एक जुटता के अभाव के कारण उत्तर प्रदेश में अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं। यद्यपि सभी पार्टियों में मुँह मारने व विभाजित होने के कारण अब देर नहीं कि राजनीतिक हाँसिए पर अगडी जातियों का जाना बस कुछ समय की ही बात है।
भारतीय जनता पार्टी को भ्रम है कि सवर्ण जातियाँ के पास भाजपा के सिवाय और कोई चारा नहीं है। बसपा ‘भाई-चारा’ के नाम पर ब्राह्मणों को अपनी और रिझाने का प्रयास कर रही है। पिछले चुनाव में ब्राह्मण जाति ने बसपा से किनारा किया था। ठाकुर विधायकों द्वारा बसपा को धोखा दे दलबदल के कारण बसपा का विश्वास ठाकुर जाति से उठ चुका है। सपा अब ठाकुर वोट में सैंधमारी को तैयार है। सपा में आज ठाकुर जाति के १३ मंत्री है परंतु अधिकांश स्वार्थी व भ्रष्ट होने के कारण जातिगत प्रतिनिधित्व नहीं करते और अपनी जेब भरते रहे हैं। ठाकुर जाति का काफ़ी वोटर आज भी सपा के साथ दे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
मेरी बात को जातिवाद न समझा जाए बल्कि यह एक यथार्थ पर आधारित मात्र बौधिक विश्लेषण है और व्यक्तिगत मत है। मैं न किसी राजनीतिक पार्टी के पक्ष ता विपक्ष की बात नहीं कर रहा हूँ। आपको सहमत या असहमत होने का पूरा हक़ है। सभी जातियों में संत,महापुरुष व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुए है अतः किसी भी जाति को जन्म के आधार पर ऊँचा या नीचा कहना उचित नहीं होगा। यहाँ अगड़े, पिछड़े या दलित जाति की संज्ञा केवल जातियों के राजनीतिक दुरुपयोग की समझने के लिए किया गया है।
आदर्श व्यवस्था तो वह होगी जहाँ राजनीति की बात जाति-धर्म से ऊपर उठकर राष्ट्रहित व देश के उत्थान के लिए हो परंतु क्या कभी यह युग हमारे इस प्यारे देश में आ पाएगा। चलो प्रतीक्षा करते हैं।
सभी को दीपावली की शुभकामनाएँ सहित !!!

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