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इसी तरह गुपचुप होते रहे हैं सर्जिकल स्ट्राइक

indian-army29नई दिल्ली। एलओसी पर भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक को अपनी तरह का पहला कदम माना जा रहा है, लेकिन सेना ने पहले भी दूसरे देश की सीमा में घुसकर ऐसे हमलों को अंजाम दिया है। सूत्रों ने बताया कि दूसरे देश में घुसने की बात कबूलने से जंग की स्थिति आ सकती है। मौजूदा समय में मोदी सरकार पर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई का दबाव था, लेकिन सरकार जंग की स्थिति मोल लेने के लिए तैयार नहीं है।

सर्जिकल स्ट्राइक के तहत दुश्मन की सीमा में घुसकर टारगेट को नुकसान पहुंचाने के बाद अपनी सीमा में वापस लौट जाना होता है। पूरी दुनिया में ऐसे हमले किए जाते हैं और इसे जंग के तौर पर नहीं देखा जाता, क्योंकि इसमें दुश्मन की सेना के खिलाफ सीधी जंग नहीं होती। इसे ठोस खुफिया जानकारी मिलने के बाद ही गुपचुप तरीके से अंजाम दिया जाता है।

गुरुवार को सेना के डीजीएमओ ने जो बयान पढ़ा, उसमें सर्जिकल स्ट्राइक शब्द का इस्तेमाल किया गया था। ऑपरेशन कैसे चला, इसके बारे में कोई ब्यौरा नहीं दिया गया। बयान पढ़ने के बाद डीजीएमओ ने पत्रकारों के किसी सवाल का जवाब नहीं दिया। उन्होंने यह साफ नहीं किया कि हमारी सेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल को पार किया या नहीं। सूत्रों का कहना है कि सेना पहले भी एलओसी पार करती रही है, लेकिन कोई सरकार इस पर आधिकारिक तौर पर जानकारी नहीं दे सकती है।

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भारतीय सेना ने पिछले साल जून में भी म्यांमार में सर्जिकल हमले का सहारा लिया था। इसमें स्पेशल फोर्स के कमांडो ने 40 मिनट के अंदर 20 नगा उग्रवादियों का सफाया किया था। तब मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने ट्वीट किया था कि देश के दुश्मनों को यह करारा जवाब है। तब उन्होंने मीडिया को दिए बयानों इस हमले को पाकिस्तान के लिए चेतावनी बताया था। रपटों के मुताबिक, उन्होंने सेना के म्यांमार की सीमा के अंदर जाने की बात भी कही थी, लेकिन सेना के आधिकारिक बयान में यह ऑपरेशन सीमा पर हुआ बताया गया था।

कई और ऑपरेशनों में सेना के सीमा पार जाने की बात पर सरकार चुप रही। सूत्रों के मुताबिक, म्यांमार में ही 1995 में ऑपरेशन गोल्डन बर्ड के तहत भारत और म्यांमार (तब बर्मा) ने उत्तर पूर्वी राज्यों के 200 उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई की थी। भूटान में 2003 में ऑपरेशन ऑल क्लियर में उत्तर पूर्वी राज्यों के 30 उग्रवादी कैंपों का सफाया किया गया था। 1971 में बांग्लादेश के लिए हुई जंग से पहले भारतीय सेना ने मुक्ति वाहिनी के साथ पूर्वी पाकिस्तान के अंदर घुसी थी। इस बात को उस समय के सैन्य जानकार साफ मानते हैं।

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