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यूरोपियन यूनियन की अर्थव्यवस्था को ISIS के खतरे से हो सकता है फायदा

uaनई दिल्ली। खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस दुनिया के सामने सुरक्षा की बड़ी चुनौती खड़ा कर चुका है। इस चुनौती से निपटने के लिए प्रमुख देश अपने यहां सुरक्षा व्यवस्था को ज्यादा से ज्यादा दुरुस्त करने में लगे हैं। खासकर पैरिस हमले के बाद यूरोपीय देशों में भय का अलग माहौल बन गया है। इसलिए, यूरोपियन यूनियन में हथियारों की होड़ जोर पकड़ रही है। स्वाभाविक है कि सूरत-ए-हाल ऐसे ही बने रहे तो यूरोपियन यूनियन की अर्थव्यवस्था को बूस्ट मिल सकता है।

पैरिस स्थित आइफिल टावर के नीचे इन दिनों सैनिकों का जमावड़ा देखा जा रहा है। बुलेटप्रूफ जैकेट्स में मशीन गनों से लैस ये सैनिक भीड़ की गहनता से जांच कर रहे हैं ताकि किसी तरह के आतंकी खतरे को टाला जा सके। इसी तरह पूरे फ्रांस में करीब 10,000 से ज्यादा सैनिक सड़कों, महत्वपूर्ण स्थलों, बड़े स्टोर्स तथा सरकारी भवनों की निगरानी में जुटे हैं।

सिर्फ आईएसआईएस केंद्रित खतरों से निपटने के लिए फ्रांस हर दिन करीब 10 लाख यूरो (करीब 7.37 करोड़ रुपये) खर्च कर रहा है। फ्रांस की सरकार ने आतंकवाद को स्थाई खतरा मानते हुए सुरक्षा पर अपने खर्चे को बढ़ा दिया है। यही हाल यूरोप के दूसरे देशों का भी है। इस्लामी आतंकवादियों द्वारा पिछले साल पैरिस पर अटैक किए जाने के बाद इस इलाके में उस आत्मसंयम के मंत्र को भुलाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है जिसे 2010 के वित्तीय संकट के बाद अपनाया गया था। हालांकि, यूरोपीय देश अपने वित्तीय अनुशासन का त्याग नहीं कर रहे, लेकिन वहां के राष्ट्राध्यक्ष आतंकवाद के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने की नीति को अपनाने लगे हैं।

इसी कड़ी में फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयानों को भी देखा जा सकता है। उन्होंने कहा, ‘हमें आतंकवादियों की तलाश करने, उनके नेटवर्क्स ध्वस्त करने, उनकी आमदनी के स्रोत बंद करने तथा प्रॉपगैंडा एवं कट्टरता फैलाने पर रोक लगाने की जरूरत है।’ उन्होंने ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ छेड़ने की घोषणा के बाद ये बातें कहीं। उन्होंने कहा, ‘देश की सुरक्षा इलाके की स्थिरता से बड़ा मुद्दा है।’

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बहुत दिन नहीं हुए जब यूरोपियन यूनियन के नेताओं ने ग्रीस को धमकी दी थी कि अगर वह अपने बजट में कटौती और आर्थिक सुधारों को प्रमुखता नहीं देता है तो उसे यूनियन से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। इतना ही नहीं, ईयू के अधिकारियों ने फ्रांस सहित दूसरे देशों को इस बात पर लताड़ लगाई थी कि वे अपने वित्तीय घाटे को कम करने में फेल रहे। लेकिन, अब सभी सुरक्षा पर खर्चे को प्राथमिकता देने लगे हैं। 130 लोगों की जान लेने वाले पैरिस हमले के बाद यूरोपियन कमिशन के प्रेजिडेंट ने फ्रांस को बजट डेफिसिट रूल्स के तहत स्पेशल ट्रीटमेंट देना स्वीकार कर लिया ताकि वह (फ्रांस) अपने सुरक्षा कार्यक्रमों को मजबूती दे सके। उन्होंने कहा, ‘हम आतंकवाद के गंभीर खतरों से मुखातिब हैं। इसलिए, फ्रांस के साथ-साथ दूसरे देश भी इससे निपटने के रास्ते तलाशने होंगे।’

कुल मिलाकर, बड़ी बात यह है कि क्षेत्र की सुरक्षा पर खर्चे बढ़ रहे हैं और यह बढ़त आगे भी कायम रहने वाली है। इससे यूरोपियन यूनियन के देशों की आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए वह जरूरी प्रोत्साहन मिल जाएगा जिसका सालों से इंतजार था। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और पड़ोसी देशों ने आत्मसंयम के नियम के तहत अपने सिक्यॉरिटी स्पेन्डिंग्स में बड़ी कटौती की थी। 2007 से ही वेस्टर्न यूरोपियन मिलिट्री स्पेन्डिंग में 13 प्रतिशत से ज्यादा की कमी आई है। इसने इस दसक में शुरू हुई आर्थिक विकास की दरों में गिरावट को और तेज कर दिया। पिछले साल नाटो में शामिल यूरोपियन यूनियन के सिर्फ चार सदस्य देशों ने ही जीडीपी के 2 प्रतिशत सैन्य खर्च करने का लक्ष्य हासिल किया था। लेकिन, अब जब सुरक्षा चिंताएं गंभीर से गंभीरतम होती जा रही हैं, उन देशों की सोच विपरीत होती जा रही है।

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