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अमर सिंह के ‘प्रमोशन’ के बाद इन बड़े नेताओं का हो सकता है ‘डिमोशन’!

amar-mulayamलखनऊ। मंगलवार का दिन 6 साल लंबे वनवास के बाद सपा में वापसी करने वाले अमर सिंह के लिए खास रहा। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर अपना अमर प्रेम जगजाहिर किया। अमर सिंह को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव का पद दिया गया है। आपको जानकार हैरानी होगी कि नेता जी ने खुद कई सालों बाद पत्र लिखकर किसी की नियुक्ति की है।

दरअसल, प्रो. राम गोपाल, मुख्यमंत्री अखिलेश, राष्ट्रीय महासचिव आजम खां और नरेश अग्रवाल ये सभी लोग अमर सिंह को पसंद नहीं करते। साफ जाहिर है कि अमर सिंह की इस ताजपोशी का कोई विरोध न हो इसलिए ऐसा किया गया।नेता जी इस फैसले को अपना बताना चाहते रहे होंगे, क्योंकि यह बात सार्वजनिक है कि सपा में नेता जी की बात कोई नहीं टाल सकता। मुलायम सिंह ने चिट्ठी में साफ लिखा है कि आने वाले विधानसभा चुनावों में और सपा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

मुलायम सिंह की यह चिट्ठी उन लोगों के लिए सीधा संकेत है कि अमर सिंह पर मुलायम का हाथ अब भी है। आपको याद दिला दें कि बीते दिनों यादव परिवार में छिड़े गृहयुद्ध के दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और राम गोपाल यादव ने अमर सिंह पर निशाना साधा था और उन्हें ही झगड़े का जिम्मेदार ठहराया था। राम गोपाल यादव ने तो साफ तौर पर कहा था कि अमर सिंह पार्टी को बर्बाद कर देना चाहते हैं।

ये लोग होंगे असहज

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक मुलायम के इस फैसले से पार्टी में फिर नए समीकरण बनने शुरू होंगे। मुख्यमंत्री अखिलेश पर भी मुलायम के इस फैसले का असर साफ नजर आएगा उनके लिए पार्टी में लगातार असहज स्थितियां बन रही हैं। इसके अलावा पार्टी के अन्य महासचिवों प्रो. राम गोपाल यादव, नरेश अग्रवाल और आजम खान के अलावा मंत्री अरविंद सिंह गोप, राजेन्द्र चौधरी और यशवंत सिंह भी काफी असहज होंगे। इन लोगों ने कई मौकों पर अमर सिंह का मुखर विरोध किया है।

ये होंगे मजबूत

मुलायम के खास लोगों का पार्टी में वर्चस्व बढ़ेगा।इस फैसले के बाद नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव और राज्यसभा सांसद बेनी प्रसाद वर्मा पार्टी में खुद को और मजबूत महसूस करेंगे। अमर सिंह के करीबियों का निर्वसन काल खत्म हो सकता है।

अमर सिंह के महासचिव बनने से शिवपाल यादव की ताकत बढ़ेगी। अमर के दूसरे दलों के बड़े नेताओं और उद्योगपतियों के संबंधों का फायदा शिवपाल यादव को मिल सकता है। दिल्ली की राजनीति में शिवपाल की ब्रैंडिंग भी अमर करेंगे इसमें कोई शक नहीं है।

अमर के मजबूत होने से हाल ही में एसपी में आए बेनी प्रसाद वर्मा के दिन भी बहुर सकते हैं। एक जमाने में बेनी और अमर के बीच छत्तीस का आंकड़ा था, लेकिन अब बदले हालात में दोनों एक पाले में खड़े हैं। दोनों के करीब आने का बड़ा कारण अरविंद सिंह गोप हैं। कभी इन दोनों के करीब रहे गोप अब दोनों के ही निशाने पर हैं।

नौकरशाही में भी दिखेगा अमर का असर

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ब्यूरोक्रेसी में भी अमर सिंह की ताजपोशी का खासा असर दिखेगा। दीपक सिंघल तो अमर के काफी करीबी हैं। कुछ और अफसर भी हैं जिनसे अमर के अच्छे रिश्ते हैं। इसके अलावा कुछ अफसर उनके निशाने पर भी हैं। अब देखना यह है कि संगठन से पकड़ खो रहे अखिलेश यादव ब्यूरोक्रेसी में अमर सिंह का कितना दखल बर्दाश्त करते हैं। एक समय था जब अमर विरोधी वर्तमान नेताओं में से आजम खान और राम गोपाल यादव को छोड़कर बाकी सभी उनके करीबी थे।

बढ़ सकता है ओम प्रकाश सिंह का कद

फरवरी 2010 में जब अमर सिंह सपा से बाहर हुए तो उनके करीबी माने जाने वाले सभी नेताओं ने उनसे किनारा कर लिया। अमर सिंह को सबसे बड़ा झटका राजा भैया और अरविंद सिंह गोप से लगा था। ये दोनों ही उनके काफी करीबी थे। ठाकुर जाति के होने के नाते अमर सिंह यह मान कर चल रहे थे कि ये दोनों तो उनके साथ ही रहेंगे।उस वक्त ओम प्रकाश सिंह भी इसी ग्रुप में थे लेकिन फिलहाल वे शिवपाल यादव के साथ हैं। ऐसे में संगठन में उनकी ताकत बढ़ सकती है।

अमर सिंह को अखिलेश ने किया था टार्गेट

अमर सिंह के राष्ट्रीय महासचिव बनने से सीएम अखिलेश यादव के लिए भी हालात असहज हो गए हैं। अखिलेश ने हाल ही के कुछ दिनों में कई बार ‘बाहरी’ व्यक्ति का जिक्र किया है। ये भी कहा था कि वह अब किसी को अंकल नहीं कहेंगे। नाम लिए बिना कहा कि एसपी के संकट के लिए ये ‘बाहरी’ ही जिम्मेदार है। माना जा रहा है कि वह बाहरी अमर सिंह ही हैं।

अब अखिलेश को करनी होगी मशक्कत

अमर सिंह के निशाने पर आने वाले नेताओं के लिए अच्छी बात यह है कि बदली परिस्थितियों में वे सभी अखिलेश यादव के पाले में खड़े हैं। ऐसे में संगठन में उनकी स्थिति कमजोर हो सकती है पर सरकार में नहीं।

सपा में फिलवक्त हालात ये हैं कि जिन लोगों की संगठन में स्थित मजबूत होगी उनकी सरकार में नहीं सुनी जाएगी और जो सरकार में मजबूत होंगे उनकी स्थिति संगठन में कमजोर होगी। चुनाव करीब हैं ऐसे में अखिलेश के करीबी लोगों को टिकट के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।

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