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250 करोड़ गोलमाल के दागी रिटायर्ड अफसर को आजम के तीन अहम महकमों की कमान

minister-azamलखनऊ। यूपी के कबीना मंत्री आजम खान ने नगर विकास विभाग को खाला का घर बना दिया है। जिसे मन में आए उसे सचिव बना दे रहे और जिसे मन में आए उसे बेइज्जत कर हटा देते हैं। और जिसे मन चाहे उसे पर करोड़ों का टेंडर लुटाकर मालामाल कर दें। यानी सब कुछ मनमर्जी। आखिर आजम की ऐसी क्या मजबूरी या जरूरत है, जो कि उन्हें दागी और रिटायर्ड प्रमोटी आईएएस श्रीप्रकाश सिंह को नगर विकास विभाग और अल्पसंख्यक कल्याण जैसे दो-दो अहम महकमों का सचिव बनाना पड़ गया साथ ही सूडा का निदेशक। एक रिटायर अफसर पर तीन अहम महकमों की कमान। यह हाल तब जबकि तमाम सेवारत कर्मठ आईएएस से यूपी भरा है।  श्रीप्रकाश सिंह वही अफसर हैं, जिन्हें वर्ष 2008 में शासन  250 करोड़ के गोलमाल में निलंबित कर चुका है। दागी आईएएस पर आजम खान के इतनी मोहब्बत लुटाने की वजह भी है। क्योंकि लंबे समय से श्रीप्रकाश आजम की आंख-कान और नाक के बाल रहे हैं। आजम की पुतली फिरी नहीं कि प्यादे श्रीप्रकाश को पता चल जाता है कि वजीर को क्या चाहिए। सेवा नियमावली के खिलाफ जाकर आजम की ओर से सचिव पद पर रिटायर अफसर की नियुक्ति कराने की राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक कई दफा शिकायत हो चुकी है, मगर जब सब किया-धरा पंचम तल पर बैठे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मर्जी से है तो फिर कोई क्या कर लेगा।

2007 में विधानसभा चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता लगी थी। बावजूद इसके 250 करोड़ रुपये की धनराशि बगैर सक्षम स्तर से मंजूरी लिए जेएनएनयूआरएम योजना के तहत जारी कर दिया था। जिस पर शासन ने जांच के बाद वर्ष 2008 में श्रीप्रकाश सिंह व एक अन्य आईएएस अमल कुमार वर्मा को निलंबित कर दिया था। इसके अलावा श्रीप्रकाश सिंह पर करोड़ों के टेंडर में घपले के तमाम आरोप लगे हैं। निलंबन के समय श्रीप्रकाश सिंह विशेष सचिव लोकनिर्माण विभाग रहे। नगर विकास विभाग की सॉलिड वेस्ट परियोजना में पूर्व में 22 करोड़ के फर्जी बैंक गारंटी में एसपी सिंह का करीबी अफसर बीएन तिवारी फंस चुके हैं। मगर एसपी सिंह ने तिवारी के खिलाफ विभागीय जांच ही नहीं होने दी।

यही नहीं जवाहरलाल नेहरू नेशनल रूरल अर्बन मिशन के लखनऊ इलाके में कराए गए तमाम निर्माण में ठेकेदारों को गलत तरीके से करोड़ों के भुगतान का मामला सामने आया था। इसमें नूतन ठाकुर की ओर से दाखिल रिट याचिका पर 15 जुलाई 2013 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से जवाब-तलब किया था। मामला फिलहाल कोर्ट में विचाराधीन है। यही नहीं श्रीप्रकाश सिंह ने नियम विरुद्ध विभागीय आदेश 28 अगस्त 2012 को जारी किया था, जब इसकी हाईकोर्ट में शिकायत हुई तो 29 अक्टूबर 2013 को जल निगम ने पूर्व के आदेश को निरस्त कर दिया। यह आदेश आजम खान के इशारे पर हुआ था।

कैबिनेट मंत्री आजम खान से श्रीप्रकाश की पुरानी नजदीकियां हैं। जौनपुर के माधोपट्टी गांव निवासी श्रीप्रकाश सिंह 31 जुलाई 2014 को  नगर विकास विभाग के सचिव पद से रिटायर हुए। मगर जुगाड़ के चलते शुरुआत में सात महीने का सेवा विस्तार पाने में सफल रहे। मगर बाद में शासन ने दोबारा सेवा विस्तार नहीं दिया तो आजम खान ने अपना नियम लागू कर

मनमर्जी का सचिव बना दिया। इंडिया संवाद ने नगर विकास विभाग की वेबसाइट की पड़ताल की तो वहां भी श्रीप्रकाश का नाम बतौर सचिव दर्ज मिला। दरियादिली बरसाते हुए एक नहीं दो-दो महकमों का सचिव बना दिया। नगर विकास विभाग में फिर से श्रीप्रकाश सिंह सचिव तो बने ही अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में भी सचिव और सूडा के निदेशक पद पर भी बैठा दिया गया। सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने इसे मंत्री पद का दुरुपयोग बताते हुए विचित्र स्थिति करार दिया है। नूतन ने कहा है कि यूपी के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, जब दागी अफसर को

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कोई मंत्री पूरा विभाग सौंप दे। रिटायर अफसरों को सचिव बनाने संबंधी याचिका फिलहाल कोर्ट में है। इसका हवाला देकर शासन फिलहाल जांच आगे नहीं बढ़ा रहा। इंडिया संवाद ने सचिव का पक्ष जानने के लिए लखऩऊ दफ्तर 0522-2237061 पर शुक्रवार को ढाई बजे फोन किया तो उठाने वाले शख्स ने कहा कि सचिव साहब मंत्री जी के साथ फैजाबाद प्रोग्राम में शामिल होने गए हैं।

नगर विकास महकमे को दोनों हाथों से लूटने के लिए मंत्री आजम खान और सचिव श्रीप्रकाश सिंह ने पूरा गेम प्लान तैयार किया। किसी और आईएएस को टिकने ही नहीं दिया गया। विभाग के प्रमुख सचिव रहे प्रवीण कुमार और सीबी पालीवाल को विभाग से हटवा दिया। आजम खां इन दो आईएएस को जलील करने का मौका नहीं छोड़ते थे। आखिरकार विभाग से हटवाकर ही मानें। कुछ समय तक महकमा बगैर आईएएस के चलता रहा। फिर सीएम व मुख्य सचिव पर दबाव डालकर आजम ने रिटायर्ड आईएएस श्रीप्रकाश सिंह को अपना सचिव बना दिया। चालाकी करते हुए पहले ओएसडी पद पर नामित किया, फिर दो अहम महकमों का सचिव बनाया। इंडिया संवाद ने वेबसाइट चेक की तो इस पर भी श्रीप्रकाश सिंह का नाम सचिव के तौर पर दर्ज मिला।

ब्यूरोक्रेसी के सूत्र बता रहे कि यूपी के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं रहा। जब एक दागी और रिटायर्ड आईएएस को दो-दो महकमों का सचिव बनाने के साथ उसे प्रमुख सचिव का भी काम करने दिया जा रहा है। यह सरासर आईएएस कैडर नियमावली के खिलाफ है। सवाल उठता है कि जब जो अफसर रिटायर हो चुका है तो उस पर कोई सरकारी नियम लागू ही नहीं होते। ऐसे में उससे सचिव पद पर काम लेना कहां जायज है। कोई भी गड़बड़झाला होने पर कैसे रिटायर्ड अफसर को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

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