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अपने आंतरिक सर्वे में बसपा चारो खाने चित्त

MayawatiMayawatiलखनऊ। कुछ समय पहले बसपा मुखिया मायावती ने यूपी का माहौल भांपने के लिए सर्वे कराया था तो उन्हें यूपी की 62 प्रतिशत सीटों पर जीत नसीब होती दिखी। मगर बदले समीकरण के बीच फिर से उन्होंने अंदरूनी सर्वे कराया तो उनकी जमीन खिसकती नजर आई है। मायावती यह जानकार चौंक गईं कि इस बार सफलता का आंकड़ा 49 प्रतिशत पर सिमट गया है। इस आंतरिक सर्वे की रिपोर्ट अभी चार दिन पहले बसपा मुखिया को मिली है।

घटते जनाधार को देखकर मायावती पार्टी की सफलता के पुराने फार्मूले पर तेजी से अमल कर रहीं हैं। इरादा उनका सूबे में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की अभेद्य दीवार खड़ी करनी की है। यही वजह है कि फिलहाल सपा से बढ़कर बसपा ने सौ से अधिक मुस्लिम उम्मीदवारों को विधानसभा चुनाव लड़ाने की तैयारी की है। मकसद यही है कि अगर शीला के आने से सवर्ण मे ब्राह्मणों का वोट कम हो या फिर स्वामी प्रसाद मौर्या के जाने से अति पिछड़ों का भी नुकसान हो तो उसे सपा और कांग्रेस के पाले से मुस्लिम वोट निकालकर क्षतिपूर्ति की जा सके।

कांग्रेस ने यूपी में 11 प्रतिशत ब्राह्मण वोटों को हथियाने के लिए दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित को चुनाव मैदान में सीएम का चेहरा बनाकर उतारा है। भाजपा सवर्ण वोट बैंक को अपना समझती है। सवर्णों में ब्राह्ण और ठाकुर सबसे अहम जातियां हैं। ऐसे में भाजपा के ब्राह्मण वोटों में कुछ सेंध लगने की आशंका है। वहीं बसपा ने पूर्व के चुनावों में जब से सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला चला और पार्टी से कई ब्राह्मण चेहरे जोड़े, तब से ब्राह्मणों में भी बसपा की स्वीकार्यता अचानक बढ़ गई। सतीश चंद्र मिश्रा व अन्य कई ब्राह्मण चेहरे इस समय बसपा में मौजूद हैं। ऐसे में कांग्रेस के शीला कार्ड ने बसपा-भाजपा के माथे पर पसीना ला दिया है।

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सपा को सबसे ज्यादा 224 सीटें मिलीं थीं। इसके अलावा बीजेपी को 42, बसपा को 80, कांग्रेस को 29, आरएलडी को 8 और अन्य के खाते में 15 सीटें रहीं।

जब बसपा में सबकुछ दुरुस्त चल रहा था। किसी के इधर-उधर जाने की घटना नहीं थी तब मायावती के निर्देश पर हुए आंतरिक सर्वे में यूपी की 403 सीटों में से कम से कम 250 सीटें मिलने की बात सामने आई। यानी बहमुत से भी 48 सीट ज्यादा। मगर चार दिन पहले हुए सर्वे में यह आंकड़ा 180 से 190 के बीच लुढक गया है। जबकि बहुमत करीब 202 सीट हासिल करने पर मिलेगा।  जाहिर सी बात है कि बसपा मुखिया की बेचैनी बढ़ाने के लिए ये कमजोर आंकड़े काफी हैं।

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