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राजस्थान की किताबों में पुरुष ‘हीरो’, महिलाएं ‘जीरो’: रिपोर्ट

sasaजयपुर। शिक्षा में समानता का भाव समाहित रहता है, लेकिन खबर है कि राजस्थान की किताबों में पुरुषों को बड़ा और अहम बताया गया है, जबकि महिलाओं को ‘सिर्फ बच्चे पैदा करने वाला’ दर्जा दिया गया है।

दिल्ली और जयपुर के अकादमिक एक्सपर्ट्स द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट चौंकाने वाली है। इसमें कुछ उदाहरणों के जरिए खुलासा हुआ है कि पुरुषों को अहम व ताकतवर दिखाने की कोशिश की गई है। कक्षा 3 की हिंदी की किताब में ‘खेल’ नामक पाठ में सिर्फ लड़कों के खेलने की तस्वीरें लगाई गई हैं, जो यह दर्शाता है कि खेल सिर्फ लड़कों के लिए ही बने हैं।

इन रिवाइज्ड किताबों पर एक्सपर्ट देवियानी भारद्वाज का कहना है कि पिछली किताबों पर लड़कियों की तस्वीरों को कम से कम जगह मिली थी। भारद्वाज ने बताया, ‘कक्षा 8 में एक सिंधी कवि ‘संत कांवर राम’ का पाठ है, जिसमें बताया गया है कि महिला का कर्तव्य है कि वह पुरुष की बात माने, पुरुष के हिसाब से रहे। इस पाठ में कवि ने पहली पत्नी के मरने के बाद 46 साल की उम्र में दूसरी शादी की। दोनों पत्नियों से उसके तीन-तीन बच्चे हैं। कुल मिलाकर यह दर्शाया गया है कि महिलाओं का काम बच्चों को संभालना है।’

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टीम का आकलन है किताबों के किरदारों की वीरता, साहस और तमाम तरह के गुणों का ताना-बाना सिर्फ पुरुषों के इर्द-गिर्द बुना गया है व महिलाओं को हाशिए पर दिखाया गया है। राजस्थान यूनिवर्सिटी के पूर्व एचओडी राजीव गुप्ता का कहना है कि आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं, लेकिन पाठ्यक्रम में इसकी झलक नहीं है।

भारद्वाज ने बताया कि कक्षा 6 में गुलाब सिंह नाम का पाठ है, जिसमें बेटी को विरोध प्रदर्शन में जाने से रोका जाता है, जबकि बेटे को भेज दिया जाता है। बाद में जब बेटे की हत्या हो जाती है, तब बेटी को भेजा जाता है। उन्होंने कहा कि संदेश साफ है कि किताबों में दर्शाया गया है कि जब हिम्मत और साहस की बात आती है, तो पहली प्राथमिकता पुरुष ही हैं।

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