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अखिलेश जी सात हजार करोड़ कहा गए ?

prabhat ranjanप्रभात रंजन दीन
उत्तर प्रदेश के सरकारी खजाने का सात हजार करोड़ रुपया गायब है. सात हजार करोड़ रुपये का हिसाब ही नहीं मिल रहा. उत्तर प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन और उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम के शीर्ष पर बैठे भ्रष्ट अधिकारियों ने साठगांठ करके इतनी बड़ी धनराशि का गड़बड़झाला कर दिया है. इस घोटाले से प्रदेश सरकार को 450 करोड़ रुपये का सालाना नुकसान हो रहा है. नुकसान की राशि घोटाले की राशि से अलग है. ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के हजारों करोड़ रुपये का घपला करने वाले राजकीय निर्माण निगम के महाप्रबंधक आरएन यादव को सफलतापूर्वक भ्रष्टाचार करने के लिए सरकार ने पुरस्कृत किया और उन्हें उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के योजना महकमे का निदेशक बना दिया गया. आरएन यादव की ‘विशेषज्ञता’ की साख यह है कि सरकार ने उन्हें पावर कॉरपोरेशन के कार्मिक महकमे के निदेशक का भी अतिरिक्त चार्ज दे रखा है. यह मामला अगर निष्पक्ष जांच की तरफ जाए तो भ्रष्ट-पुरुष यादव सिंह प्रकरण से भी बड़ा घोटाला साबित हो. फर्क केवल इतना रहेगा कि एक का नाम यादव है और दूसरे का उपनाम यादव है. पूरा सिस्टम ऐसे लोगों पर कितना मेहरबान रहता है, उसका उदाहरण है कि जिस समय इस घोटाले की पटकथा लिखी गई उस समय ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के वित्त निदेशक रहे एसके अग्रवाल को उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग का सदस्य बना कर महिमामंडित कर दिया गया और उस समय ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के मुख्य महाप्रबंधक रहे एके अग्रवाल को रिटायर होने के बाद कॉरपोरेशन का सलाहकार नियुक्त कर लिया गया. अग्रवाल ने अपनी कंसल्टेंसी कंपनी खोल रखी है. ये सब भ्रष्टाचार करने में भी सलाहकार थे और अब भ्रष्टाचार की जांच में भी सलाहकार रहेंगे. इसी प्रायोजित-प्रक्रिया से देश से भ्रष्टाचार जाएगा. उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम मायावती के शासनकाल में भी अरबों रुपये के स्मारक-स्थापत्य घोटाले में काफी नाम कमा चुका है. मायावती सरकार के उस अरबों रुपये के घोटाले पर समाजवादी पार्टी की सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की. अब मायावती की सरकार आएगी तो वह सपा सरकार के घपले-घोटाले पचा जाएगी. भ्रष्टाचार में मायावती-अखिलेश में बेहतरीन समझदारी है.
प्रदेशभर में तकरीबन 80 विद्युत सब-स्टेशनों (उप-केंद्रों) के निर्माण के लिए जो धनराशि दी गई थी, उसमें भीषण भ्रष्टाचार किया गया है. इसमें केंद्र सरकार से करीब 20 हजार करोड़ रुपये यूपी के लिए आवंटित हुए. कानूनी प्रावधान है कि विद्युत सब-स्टेशनों के निर्माण के लिए उसी संस्था को ठेका दिया जाएगा, जिसे विशेषज्ञता और अनुभव हासिल हो. लेकिन पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के अलमबरदारों ने इस क्षेत्र में गैर-अनुभवी और गैर-विशेषज्ञ संस्था राजकीय निर्माण निगम को 51 सब-स्टेशन बनाने का बड़ा ठेका दे दिया. राजकीय निर्माण निगम की ओर से कोई योजना-प्रस्ताव, बजट-आकलन और निर्माण की तैयारियों का अग्रिम ब्यौरा भी नहीं दिया गया और ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के निदेशक (ऑपरेशंस) आरएस पांडेय की तरफ से आधिकारिक पत्र जारी कर दिया गया. निर्माण निगम के नाम से 220 केवी का 21 सब-स्टेशन बनाने और 132 केवी का 30 सब-स्टेशन बनाने की लॉटरी खोल दी गई. निर्माण निगम को ठेका देने में सारे प्रावधान ताक पर रख दिए गए और काम शुरू करने के पहले ही एक हजार करोड़ रुपये का एडवांस पेमेंट भी कर दिया गया. एक हजार करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान करने की इतनी हड़बड़ी थी कि उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन ने सीधे अपने ही फंड से निर्माण निगम को पेमेंट जारी कर दिया. इस पेमेंट के बारे में डिवीजन को कुछ पता ही नहीं चला, जबकि सारे भुगतान सम्बद्ध डिवीजन के जरिए ही होने चाहिए. बाकी बचे सब-स्टेशनों को बनाने का ठेका लार्सन एंड टूब्रो, क्रॉम्पटन ग्रीव्ज़ व कुछ अन्य नामी कंपनियों को दिया गया. इन कंपनियों ने बाकायदा सारी औपचारिकताएं पूरी कीं, योजना-प्रस्ताव दिया, अपना बजट-आकलन पेश किया और सब-स्टेशनों के निर्माण में लगने वाली सामग्री और उपकरणों का अग्रिम ब्यौरा भी प्रस्तुत किया. इन कंपनियों को कोई एडवांस भी नहीं दिया गया. प्रदेशभर में विद्युत सब-स्टेशन बन गए, लेकिन निर्माण के दरम्यान कभी उसका इंसपेक्शन नहीं हुआ और सामान व उपकरणों की गुणवत्ता की कोई जांच नहीं हुई.
सारे विद्युत सब-स्टेशन बन गए और मुख्यमंत्री ने फीता काट कर उसे शुरू भी करा दिया. राजकीय निर्माण निगम समेत अन्य निर्माता कंपनियों का भुगतान भी हो गया. लेकिन करीब सात हजार करोड़ रुपया हिसाब से गायब है. उसका कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं है. दस्तावेज बताते हैं कि 6972.35 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं मिल रहा है. कॉरपोरेशन ने सात हजार करोड़ रुपये में से 5921.88 करोड़ रुपये रूरल इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन (आरईसी) और पावर फिनांस कॉरपोरेशन (पीएफसी) से 12 प्रतिशत ब्याज की दर पर कर्ज के रूप में लिए थे. ब्याज को देखते हुए साढ़े चार सौ करोड़ रुपये का जो नुकसान हो रहा है, वह घोटाले की राशि से अलग है. अराजकता का हाल यह है कि सब-स्टेशनों के निर्माण के बाद राजकीय निर्माण निगम ने खर्चे (कैपिटलाइजेशन) का ब्यौरा प्रस्तुत करने की कोई जरूरत ही नहीं समझी. जबकि यह कानूनी अनिवार्यता है. निर्माण निगम ने बिजली घरों के निर्माण के बाद उसे हैंडओवर करने के समय न कोई सामान बचा हुआ दिखाया और जो उपकरण लगे उसका भी कोई विवरण (टेक्निकल स्पेसिफिकेशन) नहीं दिया. हैरत की बात यह है कि कई ‘मान-मनुहार’ के बाद निर्माण निगम ने महज छह बिजली घरों के निर्माण का ब्यौरा प्रस्तुत किया वह भी सिर्फ एक पन्ने में. ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के शीर्ष प्रबंधन ने इस एक पन्ने के ‘पूंजीकरण’ को भी बिना उसे जांचे-परखे पास कर दिया. भद्दा मजाक यह है कि कॉरपोरेशन ने उस एक पन्ने के ब्यौरे पर लिखा कि निर्माण निगम खुद ही अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट से इसकी जांच करा ले. निर्माण निगम द्वारा बनाए गए सब-स्टेशन अब असली औकात पर आ रहे हैं. जो ट्रांसफर्मर लगाए गए, वह कम क्षमता वाले निकल रहे हैं. उस पर भी इंजीनियरों पर दबाव दिया जा रहा है कि वे क्लीन-चिट दे दें.
सात हजार करोड़ के इस विशाल घोटाले को तकनीकी तौर पर भी देखते चलें. वर्ष 2015-16 का पारेषण (ट्रांसमिशन) टैरिफ उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग द्वारा 18.06.2015 को जारी किया गया था. आयोग ने ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के कुल वार्षिक राजस्व आवश्यकता में संभावित पूंजीकरण व्यय का 30 प्रतिशत काट कर पारेषण टैरिफ निर्धारित किया तथा इस गंभीर प्रकरण के संबंध में आवश्यक कार्रवाई के लिए जरूरी निर्देश दिए थे. कटौती का कारण यह था कि ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन का एसेट रजिस्टर आधा-अधूरा पाया गया था. इस सम्बन्ध में निदेशक (वाणिज्य) के पत्र (संख्या-265, दिनांक 27.07.2015 और संख्या-269, दिनांक 29.07.2015) द्वारा निदेशक (वित्त) से आवश्यक कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया. कॉरपोरेशन के एसेट रजिस्टर को आधा-अधूरा बताए जाने की असली वजह यह थी कि ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन (पारेषण निगम) के नाम पर कैपिटल एडवांस और सीडब्लूआईपी मद में तकरीबन सात हजार करोड़ रुपये का लंबित है. उपरोक्त धनराशि अधिकांशतः पीएफसी और आरईसी से करीब 12 प्रतिशत के ब्याज पर ऋण के रूप में ली गई है.
नवम्बर 2015 और उसके बाद की सभी समीक्षा बैठकों में इस तथ्य को उठाया गया और साथ ही इतनी बड़ी लंबित धनराशि को कम करने के लिए फील्ड इंजीनियरों से सहयोग करने का अनुरोध किया गया. वाणिज्य अनुभाग के निरंतर प्रयास से उक्त धनराशि के अनेक वर्षों के लंबित प्रकरणों को हल करते हुए बमुश्किल 15 सौ करोड़ रुपये की राशि के खर्चे का हिसाब-किताब (पूंजीकरण) जुटाया जा सका, लेकिन शेष धनराशि का हिसाब नहीं मिल रहा. इतना ही बताया जा रहा है कि 6972.35 करोड़ रुपये पाइपलाइन में हैं. इसमें 2099.40 करोड़ रुपये कैपिटल वर्किंग इन प्रोग्रेस (सीडब्लूआईपी) में, 3822.48 रुपये कैपिटल एडवांस में और 1050.47 करोड़ रुपये जमा बताए जा रहे हैं. यह आंकड़ों की आधिकारिक बाजीगरी है, आम शब्दों में जिसे हेराफेरी कहते हैं. इसी महकमे के आला अधिकारी से जब पाइप लाइन के स्रोत से लेकर निकासी के बारे में पूछा तो वे स्रोत तो बता पाए, पर निकासी के बारे में गोलमोल कर गए. उपरोक्त धनराशि में 5921.88 करोड़ वित्तीय संस्थाओं (पीएफसी व आरईसी) से 12 प्रतिशत ब्याज पर लिया गया ऋण है. इस ब्याज की प्रतिपूर्ति के लिए पूंजीगत व्यय का पूंजीकरण कर उसे वार्षिक राजस्व आवश्यकता (एआरआर) में शामिल किया जाना अत्यंत आवश्यक है. लेकिन इस पर कोई ध्यान ही नहीं दे रहा.
पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक (एमडी) विशाल चौहान को इस मामले की सारी जानकारी औपचारिक तौर पर 14.03.2016 को दे दी गई थी. इस जानकारी में यह तथ्य शामिल था कि निजी कार्यदायी संस्थाओं द्वारा कराए गए अधिकांश कार्यों का पूंजीकरण कर दिया गया है, जबकि सरकारी कार्यदायी संस्था उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम ने अब तक अपना कोई हिसाब नहीं दिया है और निगम के मद में पूंजीकरण की जरूरी औपचारिकताएं बाकी हैं. उक्त समीक्षा बैठक में सभी निदेशक मौजूद थे और बाकायदा उन सबके हस्ताक्षर से एक कार्यवृत्त (संख्या- 139, दिनांक- 17.03.2016) भी जारी किया गया.
कॉरपोरेशन के शीर्ष प्रबंधन ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम द्वारा जो 30 (132 केवी) और 21 (220 केवी) मिला कर 51 सब-स्टेशनों का निर्माण किया गया, उसके लिए मुख्यालय स्तर से एक हजार करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि राजकीय निर्माण निगम के खाते में स्थानांतरित की गई थी. उपरोक्त कार्यों का पूंजीकरण कराने के लिए प्रत्येक मासिक बैठक के साथ-साथ समय-समय पर मुख्यालय पर होने वाली समीक्षा बैठकों में भी यह महत्वपूर्ण मसला उठाया जाता रहा और संबंधित पारेषण अभियंताओं से सहयोग उपलब्ध कराने का अनुरोध किया जाता रहा, लेकिन पूंजीकरण की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई. सम्बन्धित मुख्य अभियंता की रिपोर्ट के मुवताबिक राजकीय निर्माण निगम के पास मात्र छह सब-स्टेशनों के बारे में सूचना उपलब्ध है, वह भी एक ही पेज में. राजकीय निर्माण निगम से पूंजीकरण के लिए बार-बार कहा जा रहा है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है.
इस मामले में रेखांकित करने वाला तथ्य यह भी है कि सम्बन्धित अधीक्षण अभियंता और मुख्य अभियंता कार्यालय से निर्माण निगम को एडवांस जारी नहीं किया गया. सारे नियमों को ताक पर रखते हुए एक हजार करोड़ से अधिक की राशि सीधे केंद्रीय लेखा अनुभाग से जारी कर दी गई. यही वजह है कि इस मामले में कोई भी अधिकारी या इंजीनयर हाथ डालने से हिचक रहे हैं. लेखा अनुभाग से सीधे एडवांस की इतनी भारी राशि जारी कर दी गई, लेकिन निगम से जो काम कराना था उसका कोई मापन-अंकन किया ही नहीं गया, जबकि वह नियमानुसार अत्यंत आवश्यक था. लेखा मुख्यालय के उप मुख्य लेखा अधिकारी का कहना है कि उक्त सभी भुगतान परिकल्प अनुभाग के आदेशानुसार किए गए. कार्यों का कोई विवरण कार्यालय में उपलब्ध नहीं है.
फील्ड अभियंताओं का कहना है कि फील्ड में तैनात अधिशासी अभियंताओं को किसी प्रकार के कार्यादेश और उसके भुगतान के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उनके द्वारा केवल भौतिक प्रगति की सूचना प्रेषित की जाती थी, वह भी प्रतिशत में. विडंबना यह है कि खंडों में तैनात किए गए अभियंताओं को सब-स्टेशनों के निर्माण के दौरान सामग्री और कार्य की गुणवत्ता की जांच करने के प्राथमिक काम से अलग रखा गया और निर्माण निगम को मनमाने तरीके से काम करने की आधिकारिक छूट प्रदान की गई. अब उन्हीं इंजीनियरों पर निर्माण निगम के हिसाब-किताब को क्लीन-चिट देने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. सब-स्टेशनों का निर्माण हो जाने और बाकायदा काम शुरू होने के बाद पाया जा रहा है कि सब-स्टेशनों के निर्माण में घटिया सामान लगाए गए, निम्नस्तरीय विद्युत उपकरण लगाए गए और यहां तक निर्धारित क्षमता से कम के ट्रांसफर्मर भी लगा दिए गए.
राजकीय निर्माण निगम से हिसाब (पूंजीकरण) मांगा जा रहा है तो टालमटोल किया जा रहा है और उत्तर प्रदेश ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड के शीर्ष अधिकारी इस मसले से कन्नी काट रहे हैं. स्पष्ट है कि मामला पूरी तरह संदिग्ध है. विभागीय नियमानुसार कोई भी कार्य कराने के लिए निविदा दरों का विश्लेषण कर न्यूनतम दर पर कार्य कराने का फाइनल आदेश जारी किया जाता है और सम्बन्धित कार्य की गुणवत्ता की जांच के लिए औपचारिक रूप से जिम्मेदारी आवंटित की जाती है, ताकि काम की गुणवत्ता में कमी पाए जाने पर दोषी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध कार्रवाई की जा सके. काम पूर्ण होने के बाद उसका मापन विभाग के अभियंता द्वारा किया जाता है और भुगतान के सम्बन्ध में गणना एवं कटौती लेखा शाखा द्वारा सुनिश्चित की जाती है. निर्माण निगम को जो काम दिया गया उसको देख कर यही लगता है कि राजकीय निर्माण निगम और सम्बन्धित ठेकेदार आवश्यक अभिलेखों में हेराफेरी या मैनिपुलेशन में लगे हैं, इसीलिए पूंजीकरण में अनावश्यक विलंब हो रहा है. घपला करने वाले अधिकारी मस्त हैं और उन्हीं अधिकारियों को तरक्की मिल रही है और उन्हें ही सरकार का संरक्षण भी मिल रहा है.

अरबों के इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
सब-स्टेशनों के निर्माण की पूरी प्रक्रिया से अभियंताओं को अलग रखा गया. जबकि टेंडरों के निर्धारण से लेकर सब-स्टेशनों के निर्माण और उसकी गुणवत्ता की गहन जांच के लिए बाकायदा लखनऊ, आगरा, इलाहाबाद और मेरठ में चार विद्युत मंडल बनाए गए थे और उसे आठ खंडों में विभाजित कर तमाम अभियंताओं की तैनाती की गई थी. इसके अलावा भी तमाम सरकारी तामझाम किए गए थे. इस औपचारिकता में ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन को अलग से 10 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े थे. लेकिन कॉरपोरेशन के शीर्ष अधिकारियों के निर्देश पर निदेशक और डिजाइन एंड प्रोजेक्ट के मुख्य अभियंताओं ने फील्ड इंजीनियरों को काम करने से रोक दिया था. इतनी अवधि तक सारे अभियंता बगैर काम के ही अपना वेतन उठाते रहे, सरकारी खजाने का यह नुकसान अलग से हुआ. यह भी भेद खुला है कि उत्तर प्रदेश विद्युत ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन ने सब-स्टेशनों के निर्माण का ठेका राजकीय निर्माण निगम को दिया, लेकिन निर्माण निगम ने उसे ऊंची कीमतों पर दूसरे प्राइवेट ठेकेदारों को दे दिया. यानी, निर्माण निगम ने सब-स्टेशनों के निर्माण में दो तरफा कमाई की. एक तरफ उसने सरकारी दर पर ठेका लिया और दूसरी तरफ ऊंचे दर पर दूसरे ठेकेदारों को सब-लेट कर दिया. ठेकेदारों ने सारे घटिया सामान और उपकरण लगा कर सब-स्टेशन बना डाले. अब वही सब-स्टेशन निर्धारित क्षमता से कम के पाए जा रहे हैं.

अखिलेश पचा गए मायावती के घोटाले
बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल में पार्कों, मूर्तियों और स्मारकों की स्थापना के नाम पर अरबों के घोटाले किए गए थे. उस घोटाले में मंत्रियों और नौकरशाहों के साथ राजकीय निर्माण निगम के अधिकारी लिप्त थे. 2012 में जब समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मायावती के घोटालों को खास तौर पर रेखांकित किया और यह आश्वस्त किया कि इन घोटालों की जांच होगी और दोषियों के खिलाफ समुचित कार्रवाई की जाएगी. सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल यादव ने भी इस सिलसिले में कई बयान दिए. लेकिन ये सारे बयान फर्जी साबित हुए. उपरोक्त खबर के संदर्भ में यह प्रसंग इसलिए लिखा जा रहा है कि स्मारक घोटाले में भी राजकीय निर्माण निगम के अधिकारी लिप्त थे. यह बात आधिकारिक तौर पर सामने आ चुकी है. लेकिन उस घोटाले में भी निर्माण निगम के भ्रष्ट अधिकारियों का कुछ नहीं बिगड़ा. प्रदेश के तत्कालीन लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने पार्कों और स्मारकों के निर्माण घोटाले की पूरी जांच रिपोर्ट और दोषियों को सजा की सिफारिशों का दस्तावेज मुख्यमंत्री को सौंप दिया था. लेकिन लोकायुक्त की रिपोर्ट और उनकी सिफारिशों को अखिलेश यादव ने ठंडे बस्ते में डाल दिया. भ्रष्टाचार के इतने गंभीर मामलों पर अखिलेश की संदेहास्पद चुप्पी पर लोकायुक्त ने अपनी नाराजगी भी जताई थी. लेकिन इसका भी कोई असर अखिलेश पर नहीं पड़ा. यहां तक कि लोकायुक्त ने स्मारकों के निर्माण में 15 अरब रुपये के घोटाले के लिए पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन और बाबू सिंह कुशवाहा सहित कुल 199 लोगों को दोषी ठहराते हुए उनसे रकम वसूलने की सिफारिश की थी और कहा था कि 19 लोगों के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज कराकर मुकदमा चलाया जाना चाहिए. सपा सरकार ने कुछ भी नहीं किया.
लोकायुक्त ने अपनी 88 पन्ने की जांच रिपोर्ट में मायावती सरकार में मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी और बाबू सिंह कुशवाहा से घोटाले की रकम का तीस-तीस फीसदी वसूलने की सिफारिश की थी. यह राशि 846 करोड़ रुपये होती. अभी ऊर्जा सेक्टर के एक महकमे में सात हजार करोड़ का घोटाला करने में शामिल निर्माण निगम और ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन के अधिकारियों से भी घोटाले की रकम वसूली जानी चाहिए. लेकिन घोटालों पर जब मुख्यमंत्री दम साधे बैठे हों तो कार्रवाई कैसे हो सकती है! मायावती काल में स्मारकों के निर्माण में राजकीय निर्माण निगम ने कुल 19,17,870.609 घनफुट सैंड स्टोन 50 रुपये प्रति घनफुट अधिक की कीमत बता कर खरीद दिखाई थी. इस तरह निर्माण निगम ने सैंड स्टोन की खरीद पर 9,58,93,530 रुपये का अधिक भुगतान ले लिया, जो कुल भुगतान का लगभग 34 प्रतिशत था. यानी, राजकीय निर्माण निगम ने मिर्जापुर सैंड स्टोन की खरीद में 34 प्रतिशत सरकारी राजस्व का नुकसान पहुंचाया, लेकिन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की केवल रस्म अदायगी दिखाई गई. निर्माण निगम के तत्कालीन प्रबंध निदेशक सीपी सिंह, अपर परियोजना प्रबंधक राकेश चंद्रा, एके सक्सेना, इकाई प्रभारी केआर सिंह, एसपी सिंह, एसके शुक्ला, मुरली मनोहर, सहायक स्थानीय अभियंता राजीव गर्ग, परियोजना प्रबंधक एसपी गुप्ता, पीके जैन, एसके अग्रवाल, आरके सिंह, बीडी त्रिपाठी, अपर परियोजना प्रबंधक मुकेश कुमार, हीरा लाल और एसके चौबे के खिलाफ आपराधिक मुकदमे चलाने की सिफारिश की गई थी, लेकिन लोकायुक्त की सिफारिशें नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हुई, फिर आम आदमी की बोली क्या बला है! भ्रष्टाचार का तो जोर इतना है कि यूपी के पड़ोसी राज्य में जब विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने थे तब उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपी उत्तर प्रदेश निर्माण निगम के तत्कालीन प्रबंध निदेशक सीपी सिंह को सलाहकार नियुक्त कर लिया था.

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निर्माण निगम पर अखिलेश हमेशा रहते नर्म
राजकीय निर्माण निगम बड़े-बड़े घोटालों में लिप्त रहा है, लेकिन निगम पर मुख्यमंत्री की कृपा रही है और निगम के भ्रष्ट अधिकारी फलते-फूलते रहे हैं. विधानसभा के सामने बन रहे सचिवालय और दारुलशफा परिसर के लिए फिर निर्माण निगम ने मिर्जापुर सैंड स्टोन का घपला किया. इसमें निगम के एमडी रहे आरके गोयल का नाम आया. गोयल मायावती के भी चहेते रहे हैं. गोयल ने सपाई कार्यकाल में भी बसपाई ठेकेदारों को खूब लाभ कमवाया और खुद भी मोटी कमाई की. इस पर सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने कानूनी आपत्तियां भी दर्ज कराईं और लोकायुक्त से शिकायत की. लेकिन जब लोकायुक्त की सिफारिशों अखिलेश ने अंगूठा दिखा दिया तो नूतन ठाकुर की क्या बिसात है!
निर्माण निगम की अराजकता के कारण लखनऊ में कैंसर इंस्टीट्यूट की स्थापना का समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव का ड्रीम प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पिता की स्वप्न-परियोजना भी ध्यान नहीं दिया. मुलायम ने वर्ष 2012 में सपा की सरकार बनने के बाद ही लखनऊ में कैंसर इंस्टीट्यूट बनाने का ऐलान किया था. इसके लिए लखनऊ के चक गंजरिया फार्म को उजाड़ भी दिया गया और मुलायम ने शिलान्यास भी कर दिया, लेकिन सात सौ करोड़ रुपये का यह प्रोजेक्ट आज तक खड़ा भी नहीं हो पाया.

साभार चौथी दुनिया

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