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हौसले और संघर्ष का दूसरा नाम बने क्षितिज अनेजा

27 kshwww.puriduniya.com बेंगलुरु। 23 वर्षीय क्षितिज अनेजा भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) बेंगलुरु के छात्र हैं। अपने भविष्य को लेकर महत्वाकांक्षी और खेलों से प्यार करने वाले क्षितिज अनेजा को अंग्रेजी फिल्में और टीवी सीरीज देखना पसंद है। ये सब सुनकर आपके दिमाग में क्षितिज अनेजा के बारे में कोई खास बात नहीं आई होगी। क्षितिज इसलिए खास हैं क्योंकि 9 साल की उम्र में हुए एक ऐक्सिडेंट में उनकी बाहें चली गई थीं। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से यह दुर्घटना भी क्षितिज को आगे बढ़ने और अपनी पढ़ाई पूरी करने से नहीं रोक पाई। वह ऐक्सिडेंट के एक साल बाद ही स्कूल जाने लग गए थे।

क्षितिज का कहना है कि जो कुछ भी आपके साथ होता है, वह अस्थाई तौर पर होता है। जिंदगी कभी नहीं रूकती, वह चलती रहती है। मैंने इसके साथ जीना सीख लिया है। क्षितिज गैर शिक्षण दिव्यांग कर्मचारियों के पुनर्वास के लिए काम करने वाले एक एनजीओ में काम करते हैं। क्षितिज ने कहा, ‘मैं लोगों को उत्साहित करने के लिए एक वेबसाइट बनाना चाहता हूं। मेरे जैसे कई और लोग भी हैं, लेकिन उन्हें मेरे जितना हौसला नहीं मिलता है। कई लोग थे जो इस बारे में संदेह में थे, लेकिन मेरे परिवार वालों और दोस्तों ने मुझ में विश्वास दिखाया। मेरी ममी ने मुझे लिखना सिखाया।’

क्षितिज ने 10वीं क्लास में 80 प्रतिशत और 12वीं में 91 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। हाथों से दिव्यांग होते हुए भी क्षितिज बिना किसी मदद के लिख लेते हैं, कैमरा यूज कर लेते हैं। वह वे सभी काम कर लेते हैं जो एक आम इंसान करता है। उनके जीवन पर बन रही डॉक्युमेंट्री भी अभी शुरुआती दौर में है। नई दिल्ली फिल्म्स के केशव कालरा इस डॉक्युमेंट्री को निर्देशित करेंगे। उन्होंने कहा कि इस प्रयास से वह क्षितिज के जीवन संघर्ष को उन लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं जो क्षितिज जैसी दुर्घटना का शिकार हो चुके हैं। ऐसे मामलों में लोगों को संवेदनशील बनाने की जरूरत है।
IIM बेंगलुरु के छात्र ने संस्थान की तारीफ करते हुए कहा कि संस्थान की सुविधाएं बहुत अच्छी हैं। क्षितिज ने बताया, ‘मैं जिस कमरे में रहता हूं, उसमें वे सारी सुविधाएं हैं जिनकी मुझे जरूरत होती है। न केवल बेंगलुरु बल्कि भारत में बहुत कम ऐसे संस्थान हैं जहां ऐसी सुविधाएं मिलती हैं।’ बेंगलुरु के IIM में जनवरी 2010 में दिव्यांगों की सेवा करने के लिए एक ऑफिस खोला गया था। क्षितिज ने दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से ग्रैजुएशन की थी।

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क्षितिज कहते हैं, ‘सहारनपुर गांव में घर जैसे माहौल को छोड़कर दिल्ली में रहना बहुत मुश्किल निर्णय था। मुझे लगने लगा था कि मेरी जिंदगी खत्म हो रही है। मैं पूरे तरीके से मेरे परिवार पर आश्रित था और दिल्ली में अकेला रहना बहुत मुश्किल था। मेरे घरवाले भी इस बात के लिए आश्वस्त नहीं थे कि मैं घर से दूर अकेला सब मैनेज कर लूंगा। फिर मैं 3 महीने के लिए दिल्ली में अकेला रहा। मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई।’

उन्होंने कहा कि अब मेरे घरवालों को भी लगने लगा है कि मैं अकेला आराम से सब चीजें मैनेज कर सकता हूं। बेंगलुरु में मैं यहां के लोगों को पसंद करता हूं क्योंकि वे बहुत दोस्ताना हैं। यहां का मौसम भी बहुत सुहावना लगता है। जब उनसे पूछा गया कि 10 सालों में वे खुद को कहां देखते हैं तो इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘मैं 200 देशों की यात्रा करूंगा। मैं वहां के जीवन को महसूस करना चाहता हूं और उन लोगों की बातों की सच्चाई लगाना चाहता हूं कि जो कहते हैं बाकी देश भारत की तुलना दिव्यांगों के लिए ज्यादा फ्रेंडली हैं।’

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