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NSG पर चीन इसलिए खेल रहा है भारत के साथ डबल गेम

23Why-Chinaपेइचिंग। करीब आठ साल पहले चीन ने अमेरिका के भारी दबाव में इंडिया को न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) से छूट दिलाने में समर्थन किया था। इस हफ्ते साउथ कोरिया की राजधानी सोल में एनएसजी देशों की बैठक हो रही है और उसमें इंडिया को शामिल करने के मुद्दे पर विचार किया जाना है। विरोधाभास यह है कि 2008 में चीन भारत का विरोध तो कर रहा था लेकिन खुलकर सामने नहीं आ रहा था। इस बार चीन बिल्कुल स्पष्ट है। चीन ने भारत को एनएसजी में शामिल कराने की मुहिम को लेकर कड़ा रुख अख्तियार कर रखा है। आखिर इन आठ सालों में क्या बदल गया? आखिर चीन का भारत विरोध कहां तक जाएगा?

सोमवार को चीन ने भारतीय विदेश मंत्री के उस बयान पर दो टूक प्रतिक्रिया दी जिसमें सुषमा स्वराज ने दावा किया था कि चीन एनएसजी में भारत की सदस्यता का विरोध नहीं कर रहा है। चीन ने सुषमा के बयान के बाद कहा कि परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए बिना किसी भी देश को एनएसजी में शामिल करने की बात बैठक का अजेंडा कभी नहीं रहा है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कहा कि में इस बार की वार्षिक बैठक में इस तरह का कोई मुद्दा नहीं है। चीनी प्रवक्ता ने कहा, ‘एनएसजी सदस्य नॉन-एनपीटी देशों को सदस्यता देने पर बंटे हुए हैं। वर्तमान परिस्थिति में हमलोग उम्मीद करते हैं कि एनएसजी व्यापक बातचीत के जरिए इस मसले पर अपनी समझ बनाने की कोशिश करेगी।’

निश्चित तौर पर चीन का यह रुख एनएसजी के नियमों से लगाव के कारण नहीं है। पाकिस्तान में चीन जो न्यूक्लियर प्लांट्स विकसित कर रहा है शायद उससे देश की ऊर्जा संकट से जूझने में मदद मिल सकती है लेकिन एनएसजी के अन्य सदस्य उस दावे को कबूल नहीं करेंगे जो चीनी अधिकारियों की तरफ से किए जाते हैं कि हर न्यू रिऐक्टर चीन अपने हिसाब से विकसित करेगा। चीन इस मामले में एनएसजी के नियमों का उल्लंघन करता आया है।
हालांकि चीन की यह हरकत एनएसजी मेंबर्स के बीच फूट के लिए काफी नहीं है। चीन एनएसजी नियमों का हवाला देकर भारत का विरोध राजनीतिक रूप से कर रहा है। चीन चाहता है कि भारत की एंट्री यदि एनएसजी में होती है तो पाकिस्तान की भी हो। उसे भारत से ऐतराज तब है जब पाकिस्तान इससे बाहर रहता है। 2008 में भी पेइचिंग ने पाकिस्तान को लेकर इसी तरह की कोशिश की थी।

इस बार चीन की कोशिश है कि भारत को एनएसजी में एंट्री तो मिले लेकिन कई शर्तें रखी जाएं ताकि भविष्य में पाकिस्तान के लिए भी दरवाजा खुल जाए। वह इस मामले में पाकिस्तान की सहानुभूति को खोना नहीं चाहता है। एनएसजी के कुछ और सदस्यों का रुख भी नॉन-एनपीटी देशों की एंट्री को लेकर चीन की तरह है। हालांकि इसके बावजूद भारत की सफल रणनीति के कारण विरोध व्यापक नहीं है और वह सदस्यता हासिल करने के करीब पहुंच चुका है। संभव है कि चीन को भी पीछे हटना पड़े। चीन नहीं चाहता है कि उसे किसी भी कारण दुनिया में अलगाव झेलना पड़े। वह हमेशा अपनी तवज्जो साबित करना चाहता है। पेइचिंग अमेरिका से दो-दो हाथ करने के मामले में काफी सतर्क रहता है।

चीन एनएसजी के जिन नियमों का हवाला दे रहा है उसका पालन खुद ही पाकिस्तान में रिऐक्टर लगाने में नहीं कर रहा है। पेइचिंग भारत के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को पूरी तरह से बर्बाद नहीं करना चाहता। एक्यू खान के कारण पाकिस्तान परमाणु प्रसार को लेकर बुरी तरह से घिर चुका है। इस तथ्य को चीन भी अच्छी तरह से जानता है। परमाणु प्रसार में पाकिस्तान और चीन खुद ही तंग स्थिति में हैं। नॉर्थ कोरिया में परमाणु प्रोग्राम को लेकर चीन और पाकिस्तान शक के घेरे में पहले से ही हैं।

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चीनी प्रेजिडेंट अपने पूर्ववर्ती नेताओं से ज्यादा ताकतवर हैं। वह ताकत को राजनीति इस्तेमाल करने की स्थिति में हैं। अमेरिका में उतनी शक्ति नहीं है कि वह चीन को अपनी स्थिति बदलने पर मजबूर कर दे। 2008 में जो चीन था अब उससे आगे है। अमेरिका भी 2008 वाली पोजिशन में नहीं है। हालांकि अमेरिका भारत के लिए इस बार भी दबाव बनाने की कोशिश रहा है।

चीन पाकिस्तान को अपना सबसे विश्वसनीय सहोयगी मानता है। चिनफिंग का कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ रिश्तों में और गर्माहट आई है। पिछले साल चीनी बुद्धिजीवियों ने चीन और पाकिस्तान के संबंधों को अद्भुत कहा था। पाकिस्तान चीन का सदाबहार मित्र भारत के कारण है। भारत से जितनी पाकिस्तान को समस्या है उससे कम चीन को भी नहीं है।

हालांकि चीन यह भी नहीं चाहता कि पाकिस्तान और एनएसजी के कारण वह भारत के साथ अपने संबंधों को खत्म ही कर दे। चीन को पता है कि साउथ चाइना सी को लेकर वह घिरा है और इस स्थिति में अमेरिका-भारत रणनीतिक रूप से और करीब आ सकते हैं।

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