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अकेला पड़ा चीन, बेहद करीबी है एनएसजी के लिए भारत की दौड़

09nsgwww.puriduniya.com नई दिल्ली। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) यूएस का समर्थन हासिल करने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने गुरुवार की सुबह मेक्सिको पहुंचने के बाद एक और बड़ी कामयाबी हासिल की। मेक्सिको ने भी एनएसजी में शामिल होने के लिए भारत के आवेदन को समर्थन का वादा किया है। इस तरह स्विट्जरलैंड, यूएस और मेक्सिको की ओर से एनएसजी में शामिल होने के लिए समर्थन हासिल कर भारत ने बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है। लेकिन, इसके बाद भी दुनिया के इकलौते न्यूक्लियर कार्टेल में भारत के शामिल हो पाने की संभावनाएं बेहद करीबी हैं।

संयुक्त बयान के दौरान भारत के दावे का समर्थन करते हुए अमेरिका ने कहा, ‘दोनों नेता मिसाइल टेक्नॉलजी ग्रुप में भारत की एंट्री के बाद आगे की सोच रहे हैं। प्रेजिडेंट ओबामा ने एनएसजी के लिए भारत के आवेदन का स्वागत किया है और भरोसा दिलाया है कि भारत इस सदस्यता के लिए सक्षम है। अमेरिक एनएसजी में शामिल सभी देशों से अपील करता है कि वह एनएसजी के लिए भारत के आवेदन का समर्थन करें।’

मिसाइल टेक्नॉलजी कंट्रोल रिजीम में भारत की एंट्री ने एनएसजी के लिए उसकी संभावनाओं को और बढ़ा दिया है। इसी सप्ताह की शुरुआत में भारत ने 34 देशों की सदस्या वाले इस समूह में एंट्री पाई है, यह ग्रुप दुनिया में मिसाइल और स्पेस से संबंधित टेक्नॉलजी के ट्रांसफर पर नियंत्रण रखता है। खास बात यह है कि एनएसजी में भारत के शामिल होने का प्रबल विरोध करने वाला चीन एमटीसीआर ग्रुप में नहीं है। लेकिन, विएना में इस महीने के अंत में होने वाली एनएसजी की मीटिंग के दौरान भारत को समर्थन हासिल के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं होगा।

भारत ने सभी चार समूहों में शामिल होने की मांग करने की बजाय एनएसजी और एमटीसीआर को टारगेट किया है। 2008 में भी चीन ने भारत के एनएसजी में शामिल होने के प्रयास को विफल कर दिया था, उस वक्त चीन ‘साइलेंट अपोजिशन’ के तौर पर ऐक्टिव था। आखिरकार इसके लिए जरूरी है कि वाइट हाउस से चीन को फोन कॉल किया जाए। लेकिन इस बात चीन ने पहले ही खुले तौर पर भारत को इस समूह में शामिल किए जाने के खिलाफ अपनी राय जता दी है। चीन ने नॉन प्रॉलिफिरेशन ट्रीटी में भारत के शामिल न होने का हवाला देते हुए इसका विरोध किया है। इसकी आड़ में चीन अपने दूसरे ऐतराज जाहिर कर सकता है।

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इस रणनीति का दूसरा पहलू यह है कि 2008 में बुश के शासनकाल ओबामा के दौर तक यूएस और चीन के रिश्तों में बड़ा बदलाव आ चुका है। बुश ने एनएसजी में शामिल होने के भारत के इरादे के खिलाफ अपनी राय दी थी, लेकिन ओबामा का ऐसा कोई पूर्वाग्रह नहीं है। अंतर सिर्फ इतना है कि इस बार भारत के पास नरेंद्र मोदी जैसा नेता है, जो बखूबी अपनी बात रखना जानता है, जैसे कि उस वक्त चीनी नेतृत्व को पता था कि बुश के साथ कहां खड़ा होना है। लेकिन ओबामा के साथ चीन आश्वस्त नहीं है।

इसके अलावा इस बार आर्थिक और रणनीतिक संबंधों में लगातार कटुता के चलते चीन शायद ही ओबामा की ओर से की गई फोन कॉल को बहुत महत्व दे। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि एनएसजी में दावेदारी को लेकर चीन, अमेरिका और भारत बेहद क्लोज गेम खेल रहे हैं। इस खेल में बहुत कुछ दांव पर लगा है।

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