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दक्षिणी चीन सागर विवाद पर चुप क्यों रहे भारत-अमेरिका?

09SCSwww.puriduniya.com नई दिल्ली। दक्षिणी चीन सागर (SCS) विवाद को लेकर साफतौर पर बात करने की जरूरत को लेकर PM मोदी के अमेरिका दौरे से काफी उम्मीदें लगाई जा रही थीं। उम्मीद थी कि भारत और अमेरिका इस मसले पर सीधी बात करेंगे, लेकिन मोदी और ओबामा के बीच शिखर सम्मेलन के बाद जारी दोनों देशों के साझा बयान में इस मुद्दे को जगह नहीं मिली।

इससे पहले मोदी और ओबामा सरकार के बीच सितंबर 2014 और जनवरी 2015 में शिखर वार्ता हुई थी। दोनों मौकों पर जारी साझा बयान में SCS का जिक्र किया गया था। यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हुआ जब कि फिलिपीन्स ने चीन के खिलाफ दक्षिणी चीन सागर में उसके अधिकार क्षेत्र वाले एक द्वीप पर निर्माणकार्य को लेकर अंतरराष्ट्रीय ट्राइब्यूनल में शिकायत की है। ट्राइब्यूनल को अभी इसपर फैसला देना है, लेकिन चीन ने पहले ही कह दिया है कि वह ट्राइब्यूनल के फैसले को नहीं मानेगा।

इससे पहले के मौकों पर SCS को साझा बयान में शामिल करने के भारत के फैसले को विशेषज्ञ प्रभावी कदम बता रहे थे। मालूम हो कि भारत और जापान के बीच शिखर वार्ता के बाद जारी साझा बयान में भी SCS का मुद्दा शामिल किया गया था। इस बार के साझा बयान में SCS को फौरी तौर पर ही जगह दी गई। बयान में कहा गया, ‘भारत और अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक नौसेनापरिवहन और संसाधनों के इस्तेमाल पर सहमत हैं। दोनों देशों का मानना है कि सीमा विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से हल किया जाना चाहिए।’

मोदी-ओबामा द्वारा जनवरी 2015 में जारी किए गए दूसरे साझा बयान में भी एशिया-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्र के लिए संयुक्त सामरिक सुरक्षा से जुड़ा एक दस्तावेज शामिल किया गया था। इसमें समुद्री सुरक्षा, खासतौर पर SCS में नौसेनापरिवहन और ओवर फ्लाइट की आजादी सुनिश्चित करने की बात कही गई थी।

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हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि SCS का जिक्र नहीं किए जाने का महत्व इसी साल अप्रैल में हुए रूस-भारत-चीन के बीच त्रिपक्षीय वार्ता के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। इस वार्ता में तीनों देशों ने कहा था कि समुद्री सीमा के विवादों को आपसी बातचीत और संबंधित देशों के बीच समझौतों के द्वारा सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए।

मालूम हो कि चीन और अमेरिका के बीच इन दिनों दक्षिणी चीन सागर को लेकर काफी तनातनी चल रही है। इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने की उम्मीदें हैं। चीन इसके 85 फीसद हिस्से पर अपने अधिकार का दावा करता है। अमेरिका इसे चीन का उकसाने वाला कदम बताता है। चीन द्वारा इस क्षेत्र में मानव निर्मित द्वीप बनाए जाने और उनपर हवाईपट्टी व बंदरगाह बनाने को लेकर भी अमेरिका ने कड़ी आपत्ति जताई है। चीन पहले ही किसी भी ट्राइब्यूनल का फैसला मानने से इनकार कर चुका है। फिलिपीन्स के साथ अपने विवाद को लेकर भी वह आपसी बातचीत पर जोर दे रहा है। इन घटनाओं के संदर्भ में आने वाले दिनों में SCS की गहमागहमी पर सभी देशों की नजर बनी रहेगी।

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