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सुभाष चंद्र बोस के नाम पर समानांतर सरकार चला रहा था रामवृक्ष यादव

04mathurawww.puriduniya.com मथुरा। स्वाधीन भारत सुभाष सेना (एसबीएसएस) के गरीब, कुपोषित और दिशाहीन ‘सत्याग्रहियों’ (जैसा कि वे खुद को कहते हैं) का इलाज एसएन मेडिकल कॉलेज में हो रहा है। गुरुवार की हिंसा में इन्हें तमाम चोटे आई हैं। इनके नेताओं ने इनसे कहा था कि वे अगले दो महीनों में खुद नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मिलेंगे और देश के हालात बदल जाएंगे।

जो कहानियां उन्होंने सुनाई वे हैरानी में डालने वाली थीं। जवाहर बाग में पिछले दो महीनों से बिजली नहीं थी, नतीजन वे सिर्फ दलिया और खिचड़ी खाकर काम चला रहे थे। उनके पास न तो सब्जियां थीं और न ही दूध। इनके नेताओं ने इनसे कहा था कि ये अपना आंदोलन थोड़े दिन और जारी रखें जब तक नेता जी सुभाष चंद्र बोस दोबारा सामने न आ जाएं। ये नेता खुद को ‘प्रेमी’ कहते हैं और इन्होंने सदस्यों द्वारा संगठन छोड़े जाने की हर कोशिश को विफल कर दिया था।

इनमें से ज्यादातर को आंदोलन की विचारधारा के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। गोरखपुर के रहने वाले दया शंकर (87साल) ने दावा किया,’हम 30 साल से ज्यादा समय से जय गुरुदेव को चावल और गेहूं दे रहे थे। बाद में नए ग्रुप की कमान रामवृक्ष यादव के हाथ में आ गई थी। कहा जाता है कि रामवृक्ष यादव ने सुप्रीम कोर्ट के सामने दावा किया था कि वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लोगों को सामने लाएगा और अगर वह ऐसा नहीं कर पाता है तो उसे फांसी पर लटका दिया जाए।’ शंकर ने आगे बताया कि जय गुरुदेव का निधन 2012 में हो गया था लेकिन बाद में उसने अनुयायिओं को बताया वह ही सुभाष चंद्र बोस हैं, जोकिअभी भी जिंदा हैं। रामवृक्ष यादव ने हमसे कहा था कि हम यहीं रहें और जब तक नेताजी नहीं आते हैं, उनका इंतजार करें।

पुलिस के मुताबिक इस तथाकथित आंदोलन की शुरुआत 3,000 अनुयायियों ने साल 2014 में मध्य प्रदेश के सागर जिले से शुरू की थी। उन्होंने इसे ‘संदेश यात्रा’ का नाम दिया था। पिछले दो साल से इन सत्याग्रहियों ने अपनी अजब मांगों से जिला प्रशासन की नाक में दम करके रखा था। इसकी मांगें भी बड़ी अजीब होती थीं। कभी वे एक रुपये में साठ लीटर डीजल चाहते थे, तो कभी 12 रुपये तोले सोना बेचने का दावा करते थे। यही नहीं इसके साथ ही स्वाधीन भारत की करंसी चलाने की मांग भी कर डाली थी। वे देश में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का पद भी खत्म कर देना चाहते थे। वे गुजरात, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और ओडिशा की यात्रा करते हुए आखिरकार मथुरा के जवाहर बाग में पहुंचे थे, जहां आकर वे बस गए थे। पुलिस के मुताबिक समूह के ज्यादातर सदस्य उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के हैं।

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‘सत्याग्रहियों’ की मानें तो रामवृक्ष यादव अपने-आप में ही रहता था और अनुयायियों से कभी-कभी ही बातें करता था। संगठन के सदस्यों की जिंदगी जवाहर बाग के अंदर तक ही सीमित थी। बाहरी दुनिया से उनका कोई संपर्क नहीं था। कैंप का रुटीन ज्यादा मुश्किल नहीं था। लोग सुबह तीन बजे उठ जाते थे। नहाने और ब्रेकफस्ट करने के बाद वे पूरे दिन खाली ही बैठे रहते थे और शाम पांच बजे ही डिनर कर लेते थे।

मथुरा के एसएसपी राकेश कुमार ने बताया कि दो लोग किसी तरह से कैंप से बाहर निकलने में कामयाब हो गए थे और उन्होंने अपने सिद्धार्थनगर में अपने गांव वापस जाने के लिए पुलिस की मदद मांगी थी। वे यहां अपने उन रिश्तेदारों से मिलने आए थे, जो पहले से उस कैंपमें रह रहे थे, लेकिन उन्हें भी वापस जाने नहीं दिया जा रहा था। एएसपी के मुताबिक संगठन के सदस्य बाग में अपनी समानांतर सरकार चला रहे थे।

जिला प्रशासन के रेकॉर्ड्स के पता चलता है कि 260 एकड़ में फैले जवाहर बाग में तकरीबन 2,400 पेड़ थे लेकिन अतिक्रमणकारियों ने उन्हें जला दिया था। रेकॉर्ड्स के मुताबिक 27 अप्रैल, 2015 आगरा डिविजन के कमिश्नर ने कलेक्टर और एएसपी को बताया था कि अतिक्रमणकारियों ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया है, और वे बाकी कर्मचारियों को तंग कर रहे हैं।

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