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भारत-EU के बयान में अपना जिक्र होने पर भड़का नेपाल

nepal31काठमांडू। नेपाल ने भारत-यूरोपीय संघ के संयुक्त बयान में अपना जिक्र होने पर पलटवार करते हुए कहा है कि यह गैर-जरूरी है और इससे नेपाल के लोगों की भावनाएं आहत हुईं हैं। ब्रसल्ज़ में भारत-यूरोपीय संघ सम्मेलन के बाद जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया है कि भारत और यूरोपीय संघ नेपाल में वर्ष 2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद उसके पुनर्निर्माण प्रयास में सहयोग जारी रखने का संकल्प लेते हैं, जिनमें क्षमता निर्माण और लॉन्ग टर्म ग्रोथ भी शामिल हैं।
भारत और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के बयान में यह भी कहा गया है, ‘वे (भारत और ईयू) नेपाल में स्थायी और समग्र संवैधानिक हल की जरूरत पर सहमत हैं, जो बाकी संवैधानिक मुद्दों का निश्चित समयसीमा में समाधान करेगा, साथ ही राजनीतिक स्थायित्व और आर्थिक वृद्धि को प्रोत्साहित करेगा।’

इस बयान के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि संविधान निर्माण और उसकी उद्घोषणा अनिवार्य तौर पर नेपाल के आंतरिक मामले हैं। विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है, ‘नेपाल ने लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित संविधान सभा के माध्यम से संविधान की उद्घोषणा की और संविधान में नेपाल की जनता की आकांक्षाएं पूरी तरह समाहित की गईं हैं।’

विदेश मंत्रालय ने कहा कि नेपाल अब राजनीतिक स्थायित्व और आर्थिक विकास के रास्ते पर बढ़ चला है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि संविधान की उद्घोषणा साल 2006 में शुरू हुई राष्ट्रीय शांति प्रक्रिया का औपचारिक अंत है और नेपाल ने संघीय और गणतंत्रात्मक प्रणाली जैसी व्यवस्था को अपनाने के लिए कदम बढ़ाया है।

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बयान में कहा गया है, ‘इसको लेकर यूरोपीय संघ-भारत संयुक्त बयान से न केवल भारत की जनता की भावनाएं आहत हुई हैं बल्कि यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के विपरीत किसी भी देश के आंतरिक मामले में दखलअंदाजी नहीं करने के मौलिक सिद्धांत की अवहेलना है। नेपाल सरकार सभी पक्षों से नेपाली जनता के संप्रभु और लोकतांत्रिक अधिकारों का पूर्ण सम्मान करने और अवांछनीय बयान देने से बचने का आह्वान करती है।’

बयान में कहा गया है कि नेपाल की सरकार और जनता अपने मुद्दों का संविधान के ढांचे में खुद ही हल करने में पूरी तरह समर्थ हैं। तेरहवें भारत-यूरोपीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय संघ के नेताओं ने हिस्सा लिया। भारत-यूरोपीय संघ संयुक्त बयान ऐसे समय में आया है जब भारतीय मूल के अधिकतर मधेसी पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए नये संविधान को संशोधित करने की मांग कर रहे हैं।

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