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2008 जैसी मंदी का डर बढ़ा, निवेशक खोज रहे सुरक्षित ठिकाने

bearsन्यू यॉर्क। वैश्विक अर्थव्यवस्था के 2008 की मंदी जैसी स्थिति में पहुंचने के भय ने पूरे बाजार को झकझोर दिया है और निवेशक अपने लिए सुरक्षित ठिकानों की तलाश में जुटे हैं। कच्चे तेल की कीमतें 12 साल के निचले स्तर पर हैं, इसके अलावा चीन की इकॉनमी ने भी पूरी दुनिया के लिए मंदी के संकेत देने का काम किया है। द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंक हालात को संभालने में जुटे हुए हैं, लेकिन उनके पास विकल्पों की सीमा है। स्विटजरलैंड के दावोस में जुटे दुनिया के आर्थिक दिग्गजों के पास पैनिक सेलिंग को रोकना खास चिंता का विषय है। खासतौर पर माइनिंग और तेल कंपनियों को मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेज में ग्लोबल स्लोडाउन का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

इसी सप्ताह की शुरुआत में जारी रिपोर्ट में चीन की विकास दर के 25 साल के निचले स्तर पर रहने की बात सामने आई थी। फाइनैंशल टाइम्स स्टॉक एक्सचेंज में इन आंकड़ों के बाद से 200 अंकों की गिरावट हो चुकी है। बाजार में पिछले साल अप्रैल के मुकाबले 20 पर्सेंट तक की गिरावट आई है, जिसे 2008 की मंदी जैसे हालातों का संकेतक कहा जा रहा है। भारत के शेयर बाजार में भी बुधवार को 660 अंकों तक भारी गिरावट हुई थी। न्यू यॉर्क के डाउ जोंस में इंडस्ट्रियस शेयर्स में 249 पॉइंट्स की गिरावट आई है। हालांकि दिन की शुरुआत में यह गिरावट 550 पॉइंट तक पहुंच गई थी। वहीं, तेल के दाम 27.78 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गए, यह 2014 की गर्मियों के मुकाबले तेल के दामों में 70 पर्सेंट तक की गिरावट है। तब तेल के दाम वैश्विक बाजार में 115 डॉलर प्रति बैरल थे।

इसके अलावा रूस, ब्राजील और सऊदी अरब जैसे देशों की अर्थव्यवस्थाओं का बाजार भी गोता लगा रहा है। द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक तेल के दामों में कमी से पहले ही जूझ रहे इन देशों को आर्थिक संकट से निपटने के लिए अपने फॉरन रिजर्व को बाहर निकालना पड़ सकता है। ग्लोबल इक्विटीज ने इस साल की शुरुआत में ही रेकॉर्ड खराब प्रदर्शन किया है। बैंक ऑफ इंटरनैशनल सेटलमेंट्स के पूर्व चीफ इकॉनमिस्ट विलियम वाइट के मुताबिक केंद्रीय बैंकर्स को इस समस्या से निपटने के लिए सभी तरीके अपनाने चाहिए थे।

विलियम वाइट ने बड़े ग्लोबल स्लोडाउन के संकेत देते हुए कहा, ‘परिस्थितियां 2007 के मुकाबले काफी खराब हैं। मैक्रोइकॉनमित संकट से निपटने के लिए हम अब तक सभी उपायों का इस्तेमाल कर चुके हैं। बीते आठ सालों में कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है और यह ऐसे स्तर पर पहुंच गया है, जो कुछ भी कर सकता है।’ बैंक ऑफ इंटरनैशनल सेटलमेंट्स उन चुनिंदा संस्थानों में से एक था, जिन्होंने 2006 और 2007 के दौरान ही बैंकिंग संस्थाओं को चेताया था और आखिर में यह लेहमन ब्रदर्स बैंक के क्रैश होने के तौर पर सामने आया था। ग्लोबल इकॉनमी के समक्ष चिंताएं बीते साल उस वक्त शुरू हुईं, जब चीन ने अपनी मुद्रा युआन का अवमूल्यन कर दिया। इसके बाद शंघाई स्टॉक एक्सचेंज में गिरावट का दौर दिखा, फिर अमेरिका में इंटरेस्ट रेट्स को बढ़ाने के बाद यह तेज हो गया।

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द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक आईएचएस कंसल्टेंसी के चीफ इकॉनमिस्ट नरिमन बेहरवेश ने कहा, ‘चीन की अर्थव्यवस्था में हो रहे डिवेलपमेंट्स पर पूरी दुनिया की नजर है और चीनी लीडर दुनिया को यह बताने में असफल रहे हैं कि वह परिस्थितियों को सुधार रहे हैं। लेकिन तथ्य यह है कि चीन की ग्रोथ धीमी हो रही है।’ नरिमन कहते हैं, ‘चीन के पॉलिसीमेकर्स से चूक हो गई है। उन्होंने कई गड़बड़ियां की हैं, उनकी वजह से ही बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना है।’ कुछ अर्थशास्त्री अमेरिकी फेड रिजर्व की ओर से इंटरेस्ट रेट्स में 0.5 पर्सेंट का इजाफा करने को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि ऐसे वक्त में जब ग्रोथ का पहिया पहले ही रूक रहा था, तब यह कदम उठाना गलत साबित हुआ है।

इससे अमेरिकी कारोबारियों के लिए कर्ज लेना कठिन हो गया और जमा पूंजी को बढ़ावा मिला है, जिससे बाजार में तरलता कम हो गई। हालांकि 2008 की मंदी करने वाले नॉरिएल रूबीनी ने कहा, ‘हालात 2008-09 जैसे होने नहीं जा रहे हैं।’

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