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अरुणाचल, उत्तराखंड से कांग्रेस की विदाई, अब मणिपुर की बारी !

leadershipनई दिल्ली। केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार के दो वर्ष पूरे होने से पहले कई राज्यों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच जमीनी स्तर पर तनातनी चल रही है। अरुणाचल प्रदेश और अब उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकारों के बेदखल होने के बाद दोनों दलों के बीच यह तकरार और बढ़ने की आशंका है। कांग्रेस हाईकमान अब मणिपुर को लेकर सतर्क हो गया है क्योंकि वहां असंतुष्ट विधायकों की गतिविधियां बढ़ रही हैं, जो मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।

इबोबी सिंह की ओर से हाल में कुछ मंत्रियों को हटाने का बागी विधायकों ने विरोध किया था और उन्होंने मांग की थी कि मुख्यमंत्री बागी विधायकों को शामिल कर मंत्रिमंडल का विस्तार करें। इसके बाद एआईसीसी ने इबोबी सिंह को दिल्ली बुलाया था। अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में हश्र देखने के बाद अब एआईसीसी मणिपुर में इस तरह का विवाद नहीं चाहती और इस वजह से बागी विधायकों के साथ समझौता करने की कोशिश की जा रही है। एआईसीसी के इंचार्ज वी नारायणसामी ने दावा किया, ‘हमने मणिपुर में मुद्दों को सुलझा लिया है।’

हालांकि पार्टी के बहुत से नेता मणिपुर के घटनाक्रम पर नजर रख रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश और अब उत्तराखंड में कांग्रेस के हाथों से सत्ता जाने के बाद अब संसद की कार्यवाही को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़वाहट और बढ़ सकती है और ऐसे में जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण बिलों को पास कराना केंद्र सरकार के लिए आसान नहीं होगा।

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कांग्रेस के नेताओं कपिल सिब्बल और रणदीप सिंह सुरजेवाला ने अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में अपनी सरकारों को गिराने को ‘लोकतंत्र की हत्या’ और ‘संवैधानिक नियमों का उल्लंघन’ बताते हुए इसके खिलाफ कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ने की बात कही है।

हालांकि, पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड की घटनाओं से पता चलता है कि एआईसीसी बीजेपी के षडयंत्रों पर लगाम लगाने में धीमी रही है। यह भविष्य के लिए भी एक चेतावनी है।’ दोनों राज्यों में पार्टी के अंदर पैदा हुए विद्रोह को रोकने में एआईसीसी की नाकामी से यह भी संकेत मिल रहा है कि दिल्ली और अधिकतर राज्यों में सत्ता से बाहर होने पर पार्टी हाई कमान के निर्देशों का राज्यों में और विद्रोहियों के खिलाफ ज्यादा असर नहीं हो रहा।

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