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अपर्णा यादव को मुलायम ने दी वह सीट जहां पार्टी हर चुनाव हारी

aparna27लखनऊ। समाजवादी पार्टी ने भले ही मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू को कैंट विधानसभा सीट से प्रत्याशी घोषित कर दिया हो, लेकिन यहां से जीत हासिल करना आसान नहीं होगा। यहां से आज तक समाजवादी पार्टी का कोई उम्मीदवार नहीं जीता है। 2012 में जब समाजवादी पार्टी की लहर थी, तब राजधानी की पांच विधानसभा सीटों में 3 पर पार्टी जीती थी। उस वक्त भी कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी हारी थी।

लखनऊ कैंट विधानसभा सीट पर आजादी के बाद से 7 बार कांग्रेस का कब्जा रहा जबकि बीजेपी पांच बार जीती है। वहीं, 1967 में निर्दलीय, 1969 में भारतीय क्रांति दल, 1977 में जनता दल के प्रत्याशियों ने इस सीट पर जीत हासिल की।

छोटी बहू अपर्णा यादव को लखनऊ के कैंट से चुनाव लड़ाकर मुलायम सिंह यादव एक नई परंपरा डालने जा रहे हैं। पहली बार मुलायम कुनबे का कोई सदस्य ऐसी सीट से लड़ेगा जहां यादव वोट निर्णायक नहीं हैं। इसके साथ ही सपा का बेस मुस्लिम वोट भी यहां कम है। मुलायम परिवार की राजनीति का अहम हिस्सा यादव और मुस्लिम वोट हैं। जब भी देश के इस सबसे बड़े राजनीतिक परिवार के किसी भी सदस्य ने राजनीतिक पारी शुरू की है तो उसे इन्हीं दो वोटरों की बहुलता वाली सेफ सीट दी गई। यहां तक कि राजनीति के दिग्गज खिलाड़ी मुलायम सिंह ने अपने लिए भी हमेशा ऐसी सीटें चुनीं। विधान सभा के लिए जसवंतनगर, भरथना और लोकसभा के लिए मैनपुरी, संभल, कन्नौज और आजमगढ़ सीट से मुलायम ने चुनाव लड़ा और जीते।

मुलायम सिंह के भाई शिवपाल सिंह यादव ने जब राजनीतिक करियर शुरू किया तो मुलायम ने उन्हें अपनी सेफ विधान सभा सीट जसवंतनगर सौंप दी। मुलायम के चचेरे भाई रामगोपाल यादव को भी लोकसभा का चुनाव संभल से लड़ाया गया। मुलायम के बेटे और वर्तमान सीएम अखिलेश यादव ने कन्नौज संसदीय सीट से राजनीतिक पारी शुरू की। ये सीट मुलायम सिंह ने खाली की थी। इसी तरह मुलायम की बड़ी बहू और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव जब राजनीति में उतरीं तो उन्हें फिरोजाबाद और बाद में कन्नौज से लोकसभा का चुनाव लड़ाया गया। मुलायम के भतीजे धर्मेन्द्र यादव को भी बदायूं जैसी सेफ सीट से लोकसभा भेजा गया। इनके अलावा रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव को फिरोजाबाद और मुलायम के पौत्र तेजप्रताप यादव को मैनपुरी जैसी सुपर सेफ सीटें दी गयीं। इन सभी सीटों पर यादव और मुस्लिम विनिंग कॉम्बिनेशन बनाते हैं। बताने की जरूरत नहीं कि इन सीटों पर लगातार मुलायम परिवार के सदस्य ही जीते।

अब जब लखनऊ की कैंट विधानसभा सीट पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि यहां यादव करीब बीस हजार और मुस्लिम वोटर भी करीब बीस हजार ही हैं। यहां सबसे ज्यादा ब्राह्मण वोटर करीब एक लाख, दलित वोटर 60 हजार, सिंधी वोटर 30 हजार और बाकी सवर्ण और नॉन यादव ओबीसी वोटर हैं। ओबीसी में भी लोधी वोटर सबसे ज्यादा और फिर कुर्मी वोटर हैं। ऐसे में ये साफ है कि अपर्णा यादव मुलायम परिवार की पहली ऐसी सदस्य होंगी जो उनके परंपरागत इलाके और वोटर से इतर चुनाव लड़ेंगी। अपर्णा को कैंट से लड़ाकर समाजवादी पार्टी या तो ये संदेश देना चाहती है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में उसकी स्थिति काफी मजबूत है या फिर देश की राजनीति के सबसे ताकतवार परिवार के नए सदस्यों को अब प्रदेश में दूसरी सीटों पर लड़ाई के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

कैंट में कब कौन जीता

1957 श्याम मनोहर मिश्रा कांग्रेस

1962 बालक राम वैश्य कांग्रेस

1967 बीपी अवस्थी निर्दलीय

1969 सच्चिदानंद भारतीय क्रांति दल

1974 चरण सिंह कांग्रेस

1977 कृष्ण कांत मिश्रा जनता पार्टी

1980 प्रेमावती तिवारी कांग्रेस(I)

1985 प्रेमावती तिवारी कांग्रेस

1989 प्रेमावती तिवारी कांग्रेस

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1991 सतीश भाटिया बीजेपी

1993 सतीश भाटिया बीजेपी

1996 सुरेश चंद्र तिवारी बीजेपी

2002 सुरेश चंद्र तिवारी बीजेपी

2007 सुरेश चंद्र तिवारी बीजेपी

2012 रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस

2012: चौथे नंबर पर भी समाजवादी पार्टी

2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी चौथे नंबर पर रहा था। वहीं, 2007 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी प्रत्याशी शारदा प्रताप शुक्ला को 19,290 वोट मिले थे जबकि जीतने वाले सुरेश चन्द्र तिवारी को 30,444 वोट मिले थे।

2012 में कितने वोट

रीता बहुगुणा जोशी(कांग्रेस): 63,052 वोट

सुरेश चन्द्र तिवारी(बीजेपी): 41,299 वोट

नवीन चन्द्र द्विवेदी(बीएसपी): 28,851 वोट

सुरेश चौहान(समाजवादी पार्टी): 22,544 वोट

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