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यूपी चुनाव में प्रशांत किशोर का फोकस कास्ट कार्ड पर?

pk lucknowलखनऊ। देश की राजनीति में हाइप्रोफाइल रणनीतिकार माने जाने वाले प्रशांत किशोर ने यूपी चुनावों में जातिगत कार्ड के पत्ते फेंटने की योजना बनाई है। अपनी रणनीति को अहम रूप देने के लिए प्रशांत किशोर ने यूपी में कांग्रेस की प्रदेश कमिटी के जिलास्तर के पदाधिकारियों के लिए सवालों का फॉर्मेट तैयार किया है, जिसके जवाब के आधार पर वह अपनी आगे की रणनीति तैयार करेंगे।

सूत्रों के मुताबिक, सवालों की इस सूची को मूल रूप से आठ भागों में बांटा गया है, जिसमें सबसे ज्यादा तवज्जो जातिगत फैक्टर को दी गई है। बताया जाता है कि हाल ही में जारी इन सवालों की सूची को जिला अध्यक्ष व शहर अध्यक्षों को 31 मार्च तक भर कर भेजना है। इन सवाल सूची के साथ हर जिले के पदाधिकारियों, ब्लाॅक स्तर के पदाधिकारियों व इकाई स्तर तक के पदाधिकारियों के नामों की लिस्ट भी मांगी गई है।

सवालों की सूची जिन प्रमुख भागों में बांटा गया है, उनमें जिला इकाई की स्थिति, उसकी कमजोरियों और ताकत, संगठन का स्वरूप, वर्कर्स के लिए रूपरेखा, जिले की जातिगत तस्वीर, 2009 से लेकर 2014 के बीच असेंबली और लोकसभा चुनाव में उस जिले में कांग्रेस का प्रदर्शन की तस्वीर व उसकी जीत व हार के कारक, 2014 में उस इलाके में बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन की वजहें, 2017 के चुनाव को लेकर मुद्दे, जिले में विभिन्न राजनैतिक दलों का प्रभाव व स्थिति, जिले के प्रमुख व्यक्ति और संगठन व प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन के लिए पदाधिकारियों से इनपुट जैसे हिस्से उल्लेखनीय हैं।

सूत्रों के मुताबिक, आगामी त्याेहार और डेडलाइन को देखते हुए विभिन्न जिलाधिकारी इन दिनों उस सवालों के जवाब देने और प्रश्नसूची को भरने की माथापच्ची में जुटे हुए हैं। माना जा रहा है कि यूपी में प्रशांत किशोर ब्राह्मण कार्ड खेलने के मूड में है, जिसे लेकर पार्टी में प्रदेश स्तर पर थोड़ा असंतोष उभरने लगा है। खुद ब्राम्हण होने के नाते ब्राम्हणों के प्रति उनका रुझान स्वाभाविक माना जा रहा है।

पार्टी में राय उभर रही है कि प्रदेश में सिर्फ 10-11 फीसदी ब्राम्हणों के भरोसे कांग्रेस की जीत को चमत्कार में नहीं बदला जा सकता। इस बारे में पार्टी के एक सीनियर नेता का कहना था कि शुरू से ही कांग्रेस का आधार ब्राम्हण, मुस्लिम और दलित रहे हैं। वक्त के साथ विभिन्न राजनैतिक दलों के साथ तबके शिफ़्ट होते रहे हैं। ऐसे में किसी एक तबके पर भरोसे से तस्वीर बिगड़ सकती है।

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दरअसल, पार्टी में एक धड़े का मानना है कि कांग्रेस द्वारा किसी एक तबके को तवज्जो देने से बाकी तबके दूसरी तरफ जा सकते हैं। वहीं प्रदेश के एक बड़े नेता का कहना था कि कांग्रेस का मूल वोट बैंक पिछले दो दशकों में विभिन्न राजनैतिक दलों के साथ जुड़ता गया है। ऐसे में सोशल इंजिनियरिंग के जरिए तालमेल बैठाने की कोशिश होनी चाहिए। दरअसल, पार्टी को डर है कि कहीं किसी समुदाय विशेष के साथ प्रत्यक्ष जुड़ाव उसे फायदे की बजाय नुकसान न दे दे।

इसके पीछे एक सोच यह भी सामने आ रही है कि लंबे समय से समाज के पिछड़े, वंचित व हाशिए पर रहे समुदायों के साथ खुद को जोड़ने की कोशिश में लगी कांग्रेस की यह रणनीति उसकी उस मूल सोच से मेल नहीं खाती, जिसमें पार्टी गरीब व मजबूरों के हक की लड़ाई की बात करती है।

सूूत्रों के मुताबिक, सवाल किए गए हैं-
– जिला इकाई की तीन कमियां और तीन खूबियां व ताकत,
– तीन ऐसे पाॅइंट, जिससे संगठन को मजबूती दी जा सके,
– ऐसा कैंपेन का स्वरूप जो वर्कर्स को प्रेरित व मोबलाइज कर सके,
– संख्या के आधार आपके जिले की पांच सबसे बड़ी जातियां व इन पांचों जातियों का राजनैतिक रुझान
– जिले की वो दो जातियां, जिनका किसी भी राजनैतिक दल के प्रति कोई झुकाव नहीं,
– जिले में किसके जाति प्रतिनिधित्व से इन दो जातियों को आकर्षित किया जा सकता है
– जिले में खुदरा वोट के रूप में जाने वाली जातियां,
– जिले में 2009 व 2014 में पार्टी का प्रदर्शन,
– 2012 में जिले में जीतने वाले प्रत्याशी के कारण व पार्टी की हार के कारण
– 2014 में बीजेपी के प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन के तीन कारण
– साल 2012 के चुनावों के नतीजे को प्रभावित करने वाले 3 प्रमुख कारक
– साल 2017 के चुनावों के नतीजे को प्रभावित करने वाले 3 संभावित मुद्दे
– राजनैतिक दल की पकड़वार जिले की स्थिति
– जिले में प्रमुख प्रभावशाली व्यक्ति और उनकी जाति
– जिले में पार्टी के मद्देनजर बेहतर नतीजों के लिए तीन महत्वपूर्ण इनपुट

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