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अखिलेश सरकार ने दिया सुप्रीम कोर्ट-हाई कोर्ट को ‘धोखा’

akkiलखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के सामने माना कि उसने सेवानिवृत्त जस्टिस वीरेंद्र सिंह के अलावा 4 अन्य उम्मीदवारों का नाम लोकायुक्त के पद के लिए सुझाया था। राज्य सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ द्वारा की गई आपत्तियों को दरकिनार करते हुए उसने लोकायुक्त पद के लिए इन उम्मीदवारों के नाम का प्रस्ताव दिया।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने माना है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा जस्टिस वीरेंद्र सिंह के नाम पर आपत्ति दर्ज कराए जाने के बावजूद उसने उनके नाम का प्रस्ताव किया था। मालूम हो कि राज्य सरकार पर सिंह के नाम को लोकायुक्त पद के लिए सुझाने के कारण अदालत के साथ ‘धोखाधड़ी’ करने का आरोप है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने इस संबंध में राज्यपाल के साथ हुई अपनी बातचीत का रेकॉर्ड भी पेश किया।

हलफनामे में लिखा गया है, ‘यहां हम बताना चाहते हैं कि 12 दिसंबर 2015 को राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में लोकायुक्त पद पर नियुक्ति के सिलसिले में 5 जजों के नाम का प्रस्ताव किया गया था। उन नामों में से कुछ ऐसे थे जिनको लेकर मुझमें, नेता विपक्ष और विधानसभा में सहमति थी। वहीं इन पांचों उम्मीदवारों में जस्टिस वीरेंद्र सिंह का भी नाम शामिल किया गया था, लेकिन उनके नाम को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति नहीं थी।’ यह बात अखिलेश यादव ने 1 जनवरी को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक को लिखे अपने पत्र में कही है। राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में इस पत्र को भी संलग्न किया गया है।

यह पत्र जस्टिस चंद्रचूड़ द्वारा उठाई गई आपत्तियों के बाद लिखा गया था। मालूम हो कि जस्टिस चंद्रचूड़ ने राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के सामने लोकायुक्त पद के लिए जस्टिस सिंह के नाम का प्रस्ताव करने पर आपत्ति दर्ज की थी। उन्होंने कहा कि सीएम अखिलेश यादव ने उनसे वादा किया था कि जस्टिस सिंह का नाम सुप्रीम कोर्ट के पास लोकायुक्त पद के लिए शॉर्टलिस्ट किए गए लोगों की सूची में शामिल नहीं किया जाएगा।

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इस हलफनामे में राज्य के नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्या द्वारा राज्यपाल को लिखे गए पत्र को भी संलग्न किया गया है। इस पत्र में मौर्या ने लिखा है कि मुख्य न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने जस्टिस सिंह के नाम पर सहमति नहीं दी थी। पत्र में लिखा है, ‘उनके (जस्टिस सिंह के) नाम पर मुख्य न्यायाधीश ने सहमति देने से इनकार कर दिया। उन्होंने 12 दिसबंर को लिखे अपने पत्र में इसका कारण भी दिया है।’

मालूम हो कि लोकायुक्त का चयन एक समिति करती है, जिसमें मुख्यमंत्री, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, नेता प्रतिपक्ष की एक कमिटी करती है। लोकायुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसंबर को राज्य सरकार द्वारा इस पद के लिए चुने गए उम्मीदवारों की सूची में से जस्टिस सिंह का नाम चुना था। जस्टिस सिंह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिटायर्ड जज हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक दिन बाद जस्टिस चंद्रचूड़ ने राज्य सरकार के फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने जस्टिस सिंह के नाम को लेकर अपने द्वारा उठाई गई आपत्ति की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को दी। जस्टिस चंद्रचूड़ द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर एक जनहित याचिका दायर की गई। इसमें विवादित पत्र पर नोटिस लेते हुए 19 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह लोकायुक्त के पद पर जस्टिस सिंह की नियुक्ति को रोक दे।

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