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फ्रेट कॉरिडोर खा जाएगा मुंबई के 12,000 पेड़!

corridorमुंबई। करीब एक हफ्ते पहले दिल्ली-मुंबई फ्रेट कॉरिडोर के लिए वन विभाग द्वारा अनुमति दिए जाने की खबर आने के बाद यह साफ होता जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट से पर्यावरण को तो नुकसान होगा ही, साथ ही लोगों का विस्थापन भी होगा।

सोमवार को वन अधिकारियों ने माना कि इसके निर्माण के चलते मुंबई महानगरीय क्षेत्र को 12 हजार पेड़ों का नुकसान होगा। वहीं रायगढ़ जिले के 24 गांवों के 20 हजार परिवारों ने दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए अपनी जमीन देने से इनकार कर दिया। यह कॉरिडोर भी इसी फ्रेट कॉरिडोर का हिस्सा है।

यह प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष प्रोजेक्ट्स में से एक है। इसमें करीब 90 अरब डॉलर का खर्च आएगा जिसमें 1,483 किलोमीटर की एक रेल लाइन का निर्माण भी शामिल है। इस लाइन के निर्माण से मुंबई को होने वाले संभावित पर्यावरण नुकसान ने पर्यावरणविदों को हैरान कर दिया है। यह फ्रेट कॉरिडोर मुंबई के संजय गांधी नैशनल पार्क से होकर गुजरेगा। साथ ही इसके निर्माण से ठाणे और दाहानु में पेड़ों के बड़े इलाकों को नुकसान होगा।

वन अधिकारियों से मिली जानकारी के आधार पर बताया कि ठाणे और दाहानु में कुल 11,900 पेड़ों को हटाया जाएगा। वहीं नैशनल पार्क का 10.55 हेक्टेयर हिस्सा अलग कर दिया जाएगा। यहां रेल ट्रेक बनाने के लिए 1,300 से ज्यादा पेड़ों को काटा जाएगा। ठाणे जिले की 16.17 हेक्टेयर जमीन रेल ट्रेक बनाने के लिए इस्तेमाल की जाएगी जिससे यहां 678 पेड़ों का नुकसान होगा। वहीं दाहानु में 31.1 हेक्टेयर के करीब 10,000 पेड़ों को हटाया जाएगा।

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हालांकि अधिकारियों ने कहा है कि वे हर पेड़ के बदले 10 पेड़ लगाने की कोशिश करेंगे। प्रोजेक्ट के चीफ मैनेजर एके राय ने कटने वाले पेड़ों की संख्या पर कहा है कि एसजीएनपी में सिर्फ 279, ठाणे में 628 और दाहानु में 431 पेड़ काटे जाएंगे। हालांकि उन्होंने माना है कि, ‘वनों से अलग इलाकों को मिलाकर कटने वाले पेड़ों की संख्या 12 हजार के करीब होगी।’ इस बीच गांव वालों ने भी इस पर अपना विरोध जताया। उन्होंने इस संबंध में राज्य सभा स्टैंडिंग कमिटी को पत्र लिखा है।

इस कॉरिडोर का विरोध कर रही सर्वहारा आंदोलन की प्रमुख अल्का महाजन के मुताबिक जबर्दस्ती किए गए इस भूमि अधिग्रहण के आगे चल कर नुकसान होंगे। उन्होंने कहा, ‘प्रोजेक्ट से बड़ी तादाद में लोगों का विस्थापन होगा। तटीय नियमों के उल्लंघन से नुकसान होगा। इतने बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े स्तर पर पानी की जरूरत होती है, वे कहां से इसका इंतजाम करेंगे? इससे पानी का संकट पैदा हो जाएगा। साथ ही कृषि के लिए इस्तेमाल होनी वाली जमीन को खोने से खाद्य प्रधानता पर असर पड़ेगा।’

किसानों ने आरोप लगाया है कि अधिग्रहण की प्रकिया में पारदर्शिता नहीं है और किसानों से बात नहीं की गई है, बल्कि इसे एमआईडीसी ऐक्ट के तहत लाया गया है जोकि नए भूमि अधिग्रहण ऐक्ट के लाभों से उन्हें वंचित करता है।

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