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नफरत भरे भाषणों पर लगाम कसने को सुप्रीम कोर्ट पहुंचे लोग

Judiciaryनई दिल्ली। प्रबुद्ध नागरिकों, न्यायविदों, पुलिस अधिकारियों, वैज्ञानिकों और कारोबारियों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश व सुप्रीम कोर्ट के अन्य जजों को नफरत से भरी टिप्पणियों और भाषणों को रोकने के लिए स्वत: संज्ञान लेने की अपील की है। इन लोगों ने मंत्रियों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा दिए जाने वाले ‘खतरनाक और धमकाने’ भाषणों के खिलाफ अदालत से कार्रवाई करने की अपील की है। इस सूची में मानव संसाधन मंत्रालय के कनिष्ठ मंत्री राम शंकर कठेरिया द्वारा दिया गया विवादित बयान भी शामिल है।
मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर और बाकी जजों को लिखे गए इस पत्र पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस पी.बी. सावंत, पंजाब पुलिस के पूर्व प्रमुख जूलियो रिबेरियो के भी दस्तखत हैं। इसमें कहा गया है कि ऐसे बयानों द्वारा देश को एक कगार पर धकेला जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट से अपील की गई है कि ऐसे भाषणों से जुड़े विडियो, रेकॉर्ड और कागजातों-दस्तावेजों पर नजर रखने और देश के अंदर कमजोर व हाशिये पर जी रहे वर्गों पर ‘नफरत की आड़ लेकर’ हो रहे हमलों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट एक स्थायी समिति का गठन करे।

पत्र में लिखा गया है कि इन बयानों के कारण ‘नागरिकों, हाशिये पर पड़े सामाजिक वर्गों, खासकर अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासियों के बीच डर और असुरक्षा पसरती जा रही है।’ आगरा में हुए वाकये का जिक्र करते हुए पत्र में लिखा गया है, ‘मंत्री, सांसद, विधायक और बाकी दोषियों को धारा 51 के अंतर्गत अपना संवैधानिक दायित्व पूरा ना करने के लिए सजा दी जानी चाहिए।’ मालूम हो कि संविधान की इस धारा में अंतर्गत जनप्रतिनिधों पर शांत और भाईचारा की भावना को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी होती है।

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मालूम हो कि आगरा में विश्व हिंदू परिषद के नेता की हत्या के बाद एक शोकसभा में पहुंचे केंद्रीय मंत्री कठेरिया ने कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कई आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं। पत्र में विदेश मंत्रालय में राज्यमंत्री जनरल वी.के. सिंह, साध्वी निरंजन और योगी आदित्यनाश और साक्षी महाराज सहित बीजेपी के कई सांसदों के नाम और उनके द्वारा दिए गए विवादित व आपत्तिजनक बयानों का भी जिक्र किया गया है।

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