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“कँचन (मेरी तीसरी कहानी)”

writerअनामिका वाजपेयी

उसने एक हाथ में झोला उठाया जिसमें आशीष के कुछ कपड़े और थोड़ा सा ज़रुरत का सामान था। डेढ़ साल का नन्हा आशीष उसके वक्ष से लगा सो रहा था, दुनिया की हक़ीक़त से बेख़बर। किराये भर के चंद रूपये ले कर और मन में एक निश्चय के साथ कँचन ने घर की देहरी के बाहर अपना अंतिम पग रख दिया था, फ़िर कभी मुड़कर न देखने के लिये। छः बहनों की सबसे छोटी बहन, घर में सबकी लाड़ली। बड़ी बहनों के रहते कभी घर के काम न करने पड़े थे, बस एक ही काम था जो उसे हमेशा करना होता, वो था कॉलेज जाना और फ़िर सारा दिन क़िताबों में सिर खपाना। दिन बीतते गये और कँचन अब रसायन विज्ञान में परास्नातक हो चुकी थी। एक-एक कर सारी बहनें अपने-अपने घर ब्याह कर जा चुकी थीं। कँचन ने अब एक विद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया था, समय रहते बीएड भी कर लिया। कँचन के दिन इसी तरह गुज़र रहे थे। पिता के लिये कँचन की शादी से बढ़कर अब कोई ज़िम्मेदारी नहीं बची थी अतः एक बैंक में काम करने वाले शैल के साथ कँचन की शादी पक्की की और शुभ दिवस पर यह कार्य भी संपन्न हुआ। पिता के घर से विदा होकर शैल के घर की देहरी पूजते हुये मन में सोचती जाती कि अब यहीं से मेरी अंतिम यात्रा होगी। गृहणी, पत्नी, बहू और माँ बस यही रूप तो सोचे थे अपने लिये कँचन ने, इतने ही उसके सपने और इतनी ही उसकी दुनिया, उसके आस-पास की दुनिया इससे अलग़ कब थी। लेकिन, नियति को तो शायद कुछ और ही मंज़ूर था। शैल, यथा नाम तथा गुण। शैल को कँचन का साधारण रूप रंग पसंद न था। विवाह किस मजबूरी में किया था ये तो ईश्वर ही जानें। घर को बनाने, बसाने की कँचन की हर कोशिश शैल को नागवार गुज़रती। जब किसी को कोई व्यक्ति अप्रिय होता है तो उसके द्वारा किया गया हर कार्य अवाँछित लगता है, अतः कँचन एक रूपया भी खर्चती तो वह शैल की नज़रों में फ़िज़ूलखर्ची होता। धीरे-धीरे इन बातों में सास की शह भी शामिल हो गयी। अब हर छोटी से छोटी बात तिल का ताड़ बन जाती। कँचन यह सोचकर सब सहती कि हर घर की यही कहानी होती है, मैं कौन सी अनोखी हूँ। इस बीच आशीष का जन्म हुआ, कँचन को लगा कि शायद अब स्थितियाँ कुछ बदल जायेंगी। लेकिन, ये तो एक मरीचिका थी, और मरीचिका कोई समस्या नहीं कि जिसका कोई हल हो। स्थितियाँ बदलती तो हैं, कँचन की भी बदलीं, पहले से भी बदतर। आख़िरकार शैल ने सीमायें तोड़ ही दीं और कँचन को पीटते हुये कहा की अग़र ज़रा भी ग़ैरत बाकी है तुझमें तो मुझे अपनी शक़्ल भी न दिखाना। अपमान और तिरस्कार अब असहनीय हो चला था, एक पल भी और इस घर में रुक जाना मानो मृत्यु के सामान था। सहनशक्ति की भी एक सीमा है, हतप्रभ सी कँचन को जीवन की चुनौती स्वीकार करनी थी, रह-रह कर उसे अपने नन्हे शिशु का ख़याल आता और वो सोचती कि एक बालक के लिये माता-पिता समानरूप से आवश्यक हैं, लेकिन उसे यह भी समझ आ चुका था कि स्त्री को अपमानित करने वाला पुरुष एक अच्छा पिता नहीं हो सकता। बिना पिता के शिशु का पालन किया जा सकता है परन्तु असामाजिक पिता एक अच्छी संतति के लिये घातक है। निर्णय लेकर कँचन निकल पड़ी थी जीवन का सामना करने। कँचन ने अपनी शिक्षा को आगे जारी रखने के साथ-साथ एक विद्यालय में पढ़ाना शुरू किया। आशीष की परवरिश में कँचन कोई कसर नहीं रहने देना चाहती थी, इसलिये ऍम फ़िल, पीएचडी, नेट सब कर डाला, और आख़िरकार कँचन को व्याख्याता पद मिल ही गया। बच्चा धीरे-धीरे बड़ा हो गया। इंजीनियरिंग करके आशीष की पोस्टिंग मुम्बई में हो गयी थी। कोई बहुत देर से दरवाज़े की बेल बजाये जा रहा था। आती हूँ, आती हूँ, कह कर कँचन ने दरवाज़ा खोला, देखा तो सामने आशीष खड़ा था। पच्चीस साल का आकर्षक नवयुवक है आशीष। आशीष ने झुककर माँ के पैर छुये, कँचन आश्चर्य से उसे देख रही है, ये पैर क्यों छू रहा है रे। तभी दरवाज़े की ओट से एक सुंदर नवयुवती निकल आयी है, आशीष ने अपनी माँ से उस युवती का परिचय करवाया। माँ यह तुम्हारी बहू निशा हैं, आशीर्वाद नहीं दोगी। सदा सुखी रहो मेरे बच्चों, ज़रा ठहरो। अंदर से पूजा की थाली ला कर, दोनों की आरती कर गृहप्रवेश कराया। बेटी तुम इस कमरे में आराम करो, किसी प्रकार की चिंता मत करना, आज से मैं ही तुम्हारी माँ हूँ। चाय का एक कप आशीष को दे कर कँचन सामने बैठी हैं, आशीष भी माँ को देख रहा है। विश्वास है ना माँ मुझपर, आशीष ने पूछा। प्रत्युत्तर में कँचन बस मुस्कुरा दीं। सबकुछ बहुत जल्दी में हुआ माँ, तुम्हें ख़बर ही न कर पाया। तुम जानती हो ना, मेरे दोस्त श्याम की शादी थी, जिस लड़की से श्याम की शादी हुयी है, निशा उसी की बड़ी बहन हैं। सभी लोग ये जानने को उत्सुक थे कि बड़ी बहन के अविवाहित होते हुये छोटी बहन की शादी क्यों हो रही है। सभी निशा को अविवाहित समझ रहे थे जबकि सच तो ये था कि इनकी शादी हो चुकी थी और शादी के पंद्रह दिन बाद ही रोड एक्सीडेंट में इनके पति की मृत्यु हो गयी थी। तब से ये अपशकुनी होने का कलंक अपने माथे ढ़ो रही थीं। इनके जीवन में ख़ुशियों के रंग भरने के लिये उसी मण्डप में मैंने निर्णय लिया कि मैं शादी करूँगा तो इन्ही से वरना सारी ज़िन्दगी शादी नहीं करूँगा। मैंने इन्हें अपने निर्णय के बारे में बताया तो इन्होंने मुझे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन मेरा निश्चय अडिग था। आख़िरकार सबको राज़ी होना ही पड़ा। बोलो माँ, मैंने सही किया ना? हाँ, मेरे बच्चे, तुमने बिल्कुल ठीक किया, और कँचन ने उठकर बेटे को गले से लगा लिया। मन ही मन ईश्वर को नमन किया, आज मेरी तपस्या पूर्ण हुई, अब जीवन से कुछ नहीं चाहिये।

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