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गाँधीजी के पास काँग्रेस को बर्खास्त करने के ठॊस वजह थे लेकिन नेहरू नहीं चाहते थे कांग्रेस को ख़त्म करना, क्यों?

फ़िरोज़ को गांधी बनाना नेहरू की एक बहुत बड़ी चाल थी

यूं तो नेहरू परिवार का मोहनदास करमचंद गाँधी से कॊई संबध नहीं है यह सब जानते हैं यह तो चाल थी चतुर चाचा की| अपने बेटी के पती फिरॊज़ खान के नाम को बदलकर फिरॊज़ गाँधी रखदिया ताकी भारत की जनता को बेवकूफ़ बनाकर भारत पर सदियों तक अपना कुशासन कर सके। महात्मा गाँधी को अपने पार्टी के तुरुप के पत्ते की तरह इस्तेमाल करनेवाली काँग्रेस आपको कभी नहीं बताएगी की गाँधीजी की आखरी इच्छा थी  “काँग्रेस मुक्त भारत”!

जी हाँ स्वयं गाँधीजी चाहते थे की आज़ादी के तुरंत बाद काँग्रेस पार्टी को बर्खास्त किया जाए। २७ जनवरी १९४८, उनके मौत के ठीक तीन दिन पहले उन्हॊने अपने पत्रिका ‘हरिजन’ में लिखा था की काँग्रेस को बर्खास्त किया जाए और पार्टी का पुनर्नामकण कर उसे ‘लॊक सेवक संघ’ कर दिया जाए। उन्हॊंने लिखा था की काँग्रेस के सारे सदस्य लोक सेवक संघ के स्वयं सेवक बन जाएऔर देश की सेवा में स्वंयं को अर्पित कर दे।

अब आज तक काँग्रेस ने अपने प्रिय गाँधीजी की आखरी इच्छा को पूर्ण क्यॊं नहीं किया यह तो आप भी जानते हैं। खुद इनके पार्टी के आला कमान आज भी गाँधी उपनाम को अपने नाम में जॊड कर जनता को बेवकूफ़ बना रहें हैं। कल्यानम जो की गाँधी के निजी कार्यदर्शी हुआ करते थे उनका कहना है कि ” गाँधीजी के पास काँग्रेस को बर्खास्त करने के ठॊस वजह थे। वह पार्टी देश की आज़ादी की लडाई लडने के लिए बनाई गयी थी और उसका कॊई और उद्देश्य नहीं था। एक बार देश अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद हो गया तो उस पार्टी का अस्तित्व में होना बनता ही नहीं। गाँधीजी चाहते थे की काँग्रेस को बर्खास्त करके लोक सेवक संघ या भारत के सेवक संघ बनाई जाये और सारे सदस्य जनता की सेवा में लग जाए”।

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अपने लेख में गाँधीजी एक भविष्यदर्शी की तरह लिखते हैं की अगर समय और स्वास्थ बरकरार रहा तो वे इस बात पर चर्चा करना चाहेंगे की भारत के सेवकॊं की उनके स्वामी यानी जनता के प्रती क्या कर्तव्य हॊने चाहिए। पुरुश और महिला सहित पूरे वयस्क आबादी को ऊपर उठाने की आकलन कैसे किया जा सके इसके बारें में वे चर्चा करना चाहते थे। लेकिन चालाक और दगाबाज़ नेहरू ने गाँधीजी की इस आखरी इच्छा को पूरा नहीं होने दिया। पूरा करना तो दूर जनता तक को इस बात से अंजान रखा की गाँधीजी काँग्रेस को बर्खास्त करना चहते थे। आजादी के महानायकों को किसी न किसी तरह कोने में रख कर स्वंय कूद कर प्रधानमंत्री के कुर्सी पे बैठ गये। जिसे आज उनके पडपोते अपना सिंहासन समझ रहें हैं।

१९४८ में काँग्रेस के संविधान के लिए आखरी मसौदा लिखते हुए गाँधीजी ने लोक सेवक संघ को बनाने की अपने इच्छा को जगजाहिर किया था। यह उनके द्वार लिखी गयी आखरी दस्तावेज है जो जनता के समक्ष पेश किया जाना चाहिए था। सही माईने में देखा जाए तो यह उनकी आखरी वसीयत ही मानी जाएगी। अब समकालिन परिस्थिती में इसकॊ देखा जाए तो मॊदीजी का काँग्रेस मुक्त भारत का नारा गाँधीजी की आखरी इच्छा ही है। अगर देश काँग्रेस मुक्त हुआ तो गाँधीजी की अतिंम इच्छा की पूर्ती भी हो जाएगी और उनकी आत्मा को शांती भी मिल जाएगी।

अपने महात्मा के अंतिम इच्छापूर्ती के बारे में किसी भी कांग्रेसी ने न सॊचा है और न जनता को इस बात से अवगत कराया है। अब आप ही बताइये गाँधीजी की आखरी इच्छा ” काँग्रेस मुक्त भारत” होना चाहिए या नहीं।

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