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1954 में नेहरू ने औपचारिक तौर पर मान लिया कि तिब्बत चीन का हिस्सा है और चीन के सा‍थ पंचशील समझौते पर दस्तखत कर दिया

कांग्रेस पार्टी चाहती है कि विदेश नीति से जुड़े हर प्रोग्राम में बीजेपी सरकार के प्रधानमंत्री और मंत्री जवाहरलाल नेहरू की तारीफ करें। विदेश नीति पर राज्यसभा में बहस के दौरान कांग्रेस ने इस बात को लेकर खूब हंगामा मचाया कि सुषमा स्वराज ने अपने भाषण में कहीं नेहरू या इंदिरा का जिक्र क्यों नहीं किया। लेकिन सच्चाई यह है कि विदेश के मोर्चे पर चल रही ज्यादातर दिक्कतों की जड़ में नेहरू का नाम मिलता है। कश्मीर से लेकर चीन से सीमा विवाद जैसे ज्यादातर मसले नेहरू की अदूरदर्शिता का नतीजा रहे हैं। आजादी के बाद जब देश का संविधान बनाया जा रहा था, उस दौर में चीन में क्रांति का दौर था। चीन की मौजूदा सत्ता को माओत्से तुंग की पीपुल्स रिवोल्यूशन ने उखाड़ फेंका और वामपंथी शासन की स्थापना की। पड़ोसी चीन से अच्छे रिश्ते की वकालत करने वाले भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वहां भारतीय राजदूत को माओ से मिलने भेजा। यहीं से नेहरू ने विदेश नीति के मोर्चे पर गलतियों के सिलसिले की शुरुआत की।

बीजिंग में उस वक्त राजदूत थे इतिहासकार के तौर पर मशहूर केएम पणिक्कर। माओ से मुलाकात के बाद पणिक्कर ने जो रिपोर्ट नेहरू को सौंपी उसमें उन्होंने लिखा कि ‘मिस्टर चेयरमैन माओ का चेहरा बहुत दयालु है और उनकी आंखों से उदारता टपकती है। उनके हावभाव में कोमलता दिखाई देती है। उनकी सोच दार्शनिकों वाली है और उनकी छोटी-छोटी आंखें सपनों में खोई हुई मालूम पड़ती हैं। नए चीन का ये नेता कड़े संघर्षों से निकलकर यहां तक पहुंचा है, फिर भी उनमें किसी तरह का रूखापन नहीं है। मुझे तो उन्हें देखकर नेहरूजी आपकी याद आ गई। वो भी आपकी तरह ही सच्चे मानवतावादी हैं।’ यह रिपोर्ट पढ़कर नेहरू गदगद हो गए। क्योंकि एक ही रिपोर्ट से पणिक्कर ने माओत्से तुंग और नेहरू, दोनों को मक्खन लगा दिया।

उस दौर में माओत्से तुंग दुनिया के सबसे बदनाम तानाशाहों में से एक था। उसे एक बर्बर और मक्कार नेता के तौर पर जाना जाता था। ऐसे व्यक्ति के बारे में पणिक्कर ने ऐसी चापलूसी भरी रिपोर्ट क्यों लिखी ये किसी रहस्य से कम नहीं है। कुछ लोग दावा करते हैं कि माओ ने पणिक्कर को हनीट्रैप किया था। उसने बीजिंग में उनका स्वागत ‘जवान लड़कियों’ से किया था। रिपोर्ट के करीब एक साल बाद चीन ने तिब्बत पर हमला करके उसे हड़प लिया। उस वक्त के गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल इससे बेहद नाराज हुए और उन्होंने नेहरू को जाकर बताया कि ‘चीन ने आपके राजदूत को मूर्ख बनाया है। वो अब पहले से ज़्यादा मज़बूत हो गया है और उससे सावधान रहने की ज़रूरत है।’ इस पर नेहरू ने पटेल को पत्र लिखकर कहा कि ‘तिब्बत के साथ चीन ने जो किया, वो गलत है, लेकिन हमें डरने की ज़रूरत नहीं। आखिर हिमालय खुद हमारी रक्षा कर रहा है। चीन कहां हिमालय की वादियों में भटकने के लिए आएगा।’

सरदार पटेल का दिसंबर 1950 में निधन हो गया। इसके बाद तो नेहरू को चीन के मामले में कोई रोकने-टोकने वाला भी नहीं बचा। इस समय तक चीन से लगी भारत की ज्यादातर सीमा तय नहीं थी। ऐसे में पूरे आसार थे कि दोनों देशों के बीच टकराव की नौबत आ सकती है। 1952 में नेहरू ने अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित की अगुवाई में एक प्रतिनिधि मंडल को बीजिंग भेजा। विजयलक्ष्मी पंडित ने लौटकर जो किया वो और भी हैरतअंगेज था। उन्होंने नेहरू को लिखा कि ‘माओत्से तुंग का मजाकिया लहजा कमाल का है। उनकी लोकप्रियता देखकर मुझे गांधीजी की याद आ गई।’ विजयलक्ष्मी पंडित ने चीन के पहले प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई की भी तारीफ़ों के पुल बांधे। चाऊ एन लाई समलैंगिंक थे।

1954 में भारत ने औपचारिक तौर पर मान लिया कि तिब्बत चीन का हिस्सा है और चीन के सा‍थ पंचशील समझौते पर दस्तखत कर दिए।रामचंद्र गुहा ने आधुनिक भारत का जो इतिहास लिखा है, उसमें उन्होंने बताया है कि तब प्रधानमंत्री कार्यालय में एक सर गिरिजा शंकर वाजपेयी हुआ करते थे, जो नेहरू को आगाह करते रहे कि चीन से सतर्क रहने की ज़रूरत है, लेकिन उनको लगता था कि सब ठीक है। वो ‘हिंदी चीनी भाई-भाई’  लगाने में ही मगन रहे। 1956 में चीन ने अक्साई चिन में सड़कें बनानी शुरू कर दीं। भारत-चीन के बीच जो मैकमोहन रेखा थी, उसे अंग्रेज़ इसलिए खींच गए थे ताकि असम के बाग़ानों को चीन ना हड़प ले, लेकिन अक्साई चिन’ को लेकर वैसा कुछ नहीं हुआ। 1958 में चीन ने अपना जो नक़्शा जारी किया, उसमें उसने जहां-जहां तक सड़कें बनवाई थीं, उसे अपना हिस्सा बता दिया। जबकि वो इलाके अंग्रेजों के जमाने से भारत का हिस्सा थे।

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1959 में भारत ने दलाई लामा को अपने यहां शरण दी तो माओत्से तुंग भड़क गया। इसके अगले साल चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई दिल्ली आया तो नेहरू से ऐसे मिला जैसे कोई शिकवा ही न हो। आज इंटरनेट पर चाऊ एन लाई की यात्रा का वीडियो उपलब्ध है, जिनमें हम देख सकते हैं कि कैसे सैकड़ों लोग हाथों में तख्तियां लिए उसका विरोध कर रहे थे। तख्तियों पर लिखा था ‘चीन से खबरदार’। ऐसा लग रहा था कि जो बात अवाम को मालूम थी, उससे मुल्क के वज़ीरे-आज़म ही बेख़बर थे। 1961 में भारत की फ़ौज ने कुछ इस अंदाज़ में ‘फ़ॉरवर्ड पॉलिसी’ अपनाई, मानो रक्षामंत्री कृष्ण मेनन को हालात की संजीदगी का रत्तीभर भी अंदाज़ा ना हो। लगभग ख़ुशफ़हमी के आलम में मैकमोहन रेखा पार कर चीनी क्षेत्र में भारत ने 43 चौकियां तैनात कर दीं। चीन तो जैसे मौक़े की ही तलाश में था। उसने इसे उकसावे की नीति माना और हिंदुस्तान पर ज़ोरदार हमला बोला। नेहरू बहादुर हक्के-बक्के रह गए। ‘हिंदी चीनी भाई-भाई’ के गुब्बारे की हवा निकल गई। पंचशील पंक्चर हो गया। भारत को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। चीन ने अक्साई चीन में अपना झंडा गाड़ दिया। इस युद्ध में भारत के 3000 से ज्यादा जवानों की जान गई।

कहते हैं 1962 के इस सदमे से नेहरू आख़िर तक उबर नहीं पाए थे। पणिक्कर, विजयलक्ष्मी पंडित और वी कृष्णा मेनन, नेहरू की चीन नीति के तीन पिटे हुए मोहरे थे। जिन्होंने उनको चीन के बारे में झूठी सूचनाएं दीं, क्योंकि नेहरू खुद भी सच्चाई सुनने के लिए तैयार नहीं थे। और जो लोग उन्हें हक़ीक़त बताना चाहते थे, उनकी अनसुनी की जा रही थी। नेहरू की पोलिटिकल, कल्चरल और डिप्लोमैटिक विरासत में जितने भी छेद हैं, यह उनकी एक तस्वीर है। ऐसे ही और भी कई छेद हैं- जैसे कि कश्मीर, पाकिस्तान, सुरक्षा परिषद, कॉमन सिविल कोड, महालनोबिस मॉडल, फ़ेबियन समाजवाद, पंचशील, गुटनिरपेक्षता, रूस से दोस्ती और अमेरिका से दूरी।

ये तमाम बातें मौजूदा हालात में फिर याद हो आईं। चीन के साथ फिर से सीमाओं पर तनाव है और किसी भी तरह की ख़ुशफ़हमी नुक़सानदेह है। चीन आपसे गर्मजोशी से हाथ मिलाने के फ़ौरन बाद आप पर हमला बोल सकता है, ये उसकी फ़ितरत रही है। इतिहास गवाह है और वो इतिहासबोध किस काम का, जिससे हम सबक़ नहीं सीख सकते।

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