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भारत ने यूएन की नीतियों पर कहा दो टूक

Narangसंयुक्त राष्ट्र। भारत ने कहा है कि गरीबी उन्मूलन पर ‘निरंतर फोकस’ संयुक्त राष्ट्र की संचालनात्मक गतिविधियों के केंद्र में होना चाहिए और ये गतिविधियां राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ तालमेल रखने वाली होनी चाहिए। इसके साथ ही भारत ने ‘बाहर से थोपे नुस्खों’ के खिलाफ चेताया। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय मिशन के काउंसेलर अमित नारंग ने कहा कि विश्व सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (एमडीजी) से टिकाऊ विकास लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में 2030 का अजेंडा विकास के लिए एक ‘बहुरंगी संरचना’ है, जिसका संयुक्त राष्ट्र के विकास कार्यों की ‘आपूर्ति’ के साथ पर्याप्त जुड़ाव है।

उन्होंने कहा, ‘केंद्रीय और प्राथमिक लक्ष्य के तौर पर गरीबी उन्मूलन पर ‘सतत गौर’ संयुक्त राष्ट्र की विकासात्मक संचालनात्मक गतिविधियों के केंद्र में होना चाहिए। निश्चित तौर पर यह पिछली क्यूसीपीआर (चार वर्षीय नीति समीक्षा) का जनादेश था और इस रणनीतिक दिशा को बरकरार रखा जाना चाहिए।’

2016 के आर्थिक और सामाजिक परिषद के मौलिक सत्र में ‘विकास खंड के लिए संचालनात्मक गतिविधियों’ पर अपने बयान में नारंग ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र को गरीबी की समस्या पर ज्यादा ‘सीधे’ तौर पर वार करने के लिए अपने अस्त्रों को मजबूत करना होगा। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से हाल ही में परिषद के विशेष सत्र में दिए गए संबोधन का उल्लेख किया, जिसमें भारतीय नेता ने कहा था कि पिछले 70 साल में प्रगति तो हुई है लेकिन गरीबी उन्मूलन 20वीं सदी का वह सबसे बड़ा काम है, जो अधूरा रहा है।

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नारंग ने कहा, ‘एक सार्वभौमिक अजेंडे किंतु विभिन्नता वाले अजेंडे का अर्थ सब के लिए एक ही उपाय वाला नजरिया नहीं है। जैसा कि 2030 का अजेंडा खुद कहता है कि टिकाऊ विकास लक्ष्य देशों के विभिन्न शुरुआती बिंदुओं और परिस्थितियों से अवगत होना चाहिए।’ उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की संचालनात्मक गतिविधियों को राष्ट्रीय विकास योजनाओं के अनुरूप और उनके प्रति जिम्मेदार भी होना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘बाहर से लादे गए निर्देशों से बचना चाहिए और राष्ट्रीय नीति के दायरे का सम्मान किया जाना चाहिए।’ नारंग ने कहा कि भारत मानवीय गतिविधियों में सहयोग बढ़ाने की जरूरत को मानता है, वह मानवीय विकास अंतर को कथित तौर पर पाटने की वकालत करने वाले प्रस्तावों का सूक्ष्मता से आकलन कर रहा है।

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