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32 साल पहले राजीव गाँधी और पूरी कांग्रेस थी तीन तलाक के पक्ष में लेकिन इन्ही के कैबिनेट मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने राजीव गांधी का और तीन तलाक का किया था जोरदार विरोध

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तीन तलाक के मुद्दे पर एतिहासिक फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि मुस्लिमों में तीन तलाक के जरिए दिए जाने वाले तलाक की प्रथा ‘अमान्य’, ‘अवैध’ और ‘असंवैधानिक’ है. इस पूरे मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान का जिक्र आ जाना जरूरी है. आज से 32 साल पहले उन्होंने तीन तालक के खिलाफ आवाज उठाई थी. शाहबानो केस में जहां राजीव गांधी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया था वहीं आरिफ मोहम्मद खान इस फैसले के साथ खड़े हो गए थे. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में और तीन तलाक के खिलाफ भाषण भी दिया था जो कि एतिहासिक महत्व रखता है. बाद में आरिफ ने सरकार के इस कदम के विरोध में अपना इस्तीफा भी दे दिया था.

संसद में दिया था एतिहासिक भाषण

आरिफ मोहम्मद खान ने अपना यह भाषण एम.बनातवाला द्वारा प्रस्तुत एक गैर-सरकारी विधेयक के विरोध में 23 अगस्त 1985 को लोकसभा में दिया था.उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत में देश के प्रथम शिक्षा मंत्री तथा इस्लामिक कानूनों के जानकार मौलाना आजाद के विचारों का जिक्र किया था. आरिफ खान ने कहा था कि हम दबे हुए लोगों को ऊपर उठाकर ही यह कह सकेंगे कि हमने इस्लामिक सिद्धांतों का पालन किया है, और उनके साथ न्याय किया है.

कब दिया था आरिफ मोहम्मद खान ने यह भाषण

आरिफ मोहम्मद खान ने अपना यह भाषण एम.बनातवाला द्वारा प्रस्तुत एक गैर-सरकारी विधेयक के विरोध में 23 अगस्त 1985 को लोकसभा में दिया था.उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत में देश के प्रथम शिक्षा मंत्री तथा इस्लामिक कानूनों के जानकार मौलाना आजाद के विचारों का जिक्र किया था. आरिफ खान ने कहा था कि हम दबे हुए लोगों को ऊपर उठाकर ही यह कह सकेंगे कि हमने इस्लामिक सिद्धांतों का पालन किया है, और उनके साथ न्याय किया है.

तीन तलाक के विरोध के लिए दिए एतिहासिक हवाले

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आरिफ मोहम्मद ने बताया कि तीन बार तलाक की बात उतनी सही नहीं है. सच यह है कि मोहम्मद साहब के इंतकाल के कुछ सालों बाद जब तीन बार तलाक कहने को वैध बना दिया गया, तो उस समय इसको लागू करने वाले को 40 कोड़ों की सजा दी गई थी.

क्या था शाहबानो केस

इंदौर की रहने वाली मुस्लिम महिला शाहबानो को उसके पति मोहम्मद खान ने 1978 में तलाक दे दिया था. पांच बच्चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो ने गुजारा भत्ता पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी और पति के खिलाफ गुजारे भत्ते का केस जीत भी लिया.

केस जीतने पर भी नहीं मिला हर्जाना

सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी शाहबानो को पति से हर्जाना नहीं मिल सका. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पुरज़ोर विरोध किया. इस विरोध के बाद  1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया.  इस अधिनियम के तहत शाहबानो को तलाक देने वाला पति मोहम्मद गुजारा भत्ता के दायित्व से मुक्त हो गया था.

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