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पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम को दबाव में छोड़ना पड़ा बस्तर

Bastarरायपुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर में पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता कर रहीं पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम को नक्सलियों से सहानुभूति रखने के आरोप में जेलों में बंद गरीब आदिवासियों के लिए आवाज उठाने के बदले बस्तर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है। वह जगदलपुर शहर में किराये के एक मकान में रह रही थीं। गुरुवार को उनके मकान मालिक ने उनसे घर खाली करने को कहा।

साथ ही, जगदलपुर कानूनी सहायता समूह (जीएजीएलएजी) के कुछ प्रो-बोनो वकीलों को भी उनके मकान मालिकों ने घर खाली करने का नोटिस दिया। इसके बाद इन वकीलों को आधी रात के समय घर खाली करना पड़ा। मालूम हो कि प्रो-बोनो वकील कानूनी मामलों में गरीबों और मजबूर लोगों को मदद करते हैं। ये वकील लंबे समय से नक्सली होने के आरोप में जेल के अंदर बंद आदिवासियों के लिए अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।

मालिनी न्यूज वेबसाइट स्क्रॉल.इन के लिए काम करती हैं। वह बस्तर में आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों व पुलिस ज्यादतियों की रिपोर्टिंग करती रही हैं। पिछले हफ्ते ही माओवादियों की विरोधी एक संस्था, सामाजिक एकता मंच के सदस्यों ने मालिनी के घर और कार पर हमला किया था। मालिनी का आरोप है कि उनके परिवार को दबाव में और बेहद जल्दबाजी में मजबूरन शहर छोड़ना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया है कि पिछले 5 हफ्ते से पुलिस लगातार उन्हें व उनके परिवार को धमकियां दे रही थी। मालिनी ने कहा, ‘जब धमकियों से बात नहीं बनी, तो पुलिस ने उन लोगों को निशाना बनाया जो मेरे लिए काम करते हैं या फिर उन्हें जिन्होंने रहने के लिए मुझे अपना घर किराये पर दिया है।’

स्क्रॉल.इन की न्यूज संपादक सुप्रिया शर्मा ने कहा, ‘पुलिस ने मालिनी के घर में काम करने वाली को और उनके मकानमालिक को बुधवार को हिरासत में लेकर पूछताछ की। मकानमालिक को कहा गया कि वह मालिनी को घर खाली करने का नोटिस दें। साथ ही, मालिनी व जगदलपुर कानूनी सहायता समूह के साथ काम करने वाली महिला वकीलों के मकानमालिकों को भी मजबूर किया गया कि वे अपने-अपने घरों से इन वकीलों को निकाल दें। क्या यह एक अजीब संयोग नहीं है कि इन वकीलों के मकानमालिकों ने उन्हें जिस दिन घर खाली करने को कहा, उसी दिन एक ऑनलाइन न्यूज पॉर्टल ने पुलिस द्वारा पत्रकारों को धमकाए जाने की खबर छापी थी।’

सुप्रिया ने बताया कि बेला भाटिया नाम की एक अन्य कार्यकर्ता को उनके मकानमालिक ने घर खाली करने का नोटिस दिया है। जेएजीएलएजी वकीलों ने कहा कि उन्हें भी घर खाली करने को कहा गया था। उन्होंने बताया कि यह नोटिस दिए जाने से पहले पुलिस ने उनके मकान मालिकों को हिरासत में लेकर पूछताछ की थी। इस समूह के साथ काम करने वाली एक वकील ईशा खंडेलवाल ने कहा कि वह संगठन के पास लंबित पड़े मामलों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।

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हमसे बात करते हुए बस्तर के आईजी एस.आर.पी. कल्लूरी ने कहा कि कलेक्टर ने सभी संबंधित मकानमालिकों को आदेश जारी कर उनके यहां रह रहे किरायेदारों व घरेलू सहायक की पहचान व जरूरी कागजात जमा करने को कहा था। आईजी ने कहा कि यह सामान्य कार्रवाई है।

उधर, जगदलपुर के स्थानीय बार असोसिएशन में जेएजीएलएजी को लेकर काफी गुस्सा है। उन्होंने समूह के वकीलों को बस्तर के माओवादी समर्थकों को कानूनी सहायता ना देने के लिए धमकाया है।

एमनेस्टी इंटरनैशनल इंडिया ने भी एक बयान जारी कर छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार वकीलों को नियुक्त किए जाने की मांग की है। संगठन ने कहा है कि पुलिस व अन्य लोगों-संगठनों द्वारा पत्रकारों को दी जारी धमकी, उत्पीड़न और शोषण से उनकी सुरक्षा के लिए ऐसा किया जाना जरूरी है।

जेएजीएलएजी की 2 सदस्यों, ईशा खंडेलवाल और शालिनी गेरा ने आरोप लगाया है कि उन्हें उनका काम करने से रोकने के लिए कई बार उनका शोषण किया गया है।

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