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मुश्किल समय में मोबाइल इंटरनेट पर रोक लगा सकेंगे राज्य

mobailनई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में जिला और राज्य प्रशासन की कानून और व्यवस्था की समस्याओं को रोकने के लिए मोबाइल इंटरनेट पर सीमित प्रतिबंध लगाने की शक्ति बरकरार रखी है। इस फैसले का बड़ा असर होगा और इंटरनेट फ्रीडम और सोशल मीडिया का पक्ष लेने वाले लोग इसका विरोध कर सकते हैं।
गुजरात सरकार ने पिछले वर्ष राज्य में हार्दिक पटेल की अगुवाई में पाटीदार आंदोलन के दौरान अफवाहें फैलने पर रोक लगाने के लिए कई शहरों में मोबाइल डेटा सर्विसेज पर रोक लगा दी थी। राज्य ने सीआरपीसी का सेक्शन 144 लागू किया था, जो स्थानीय प्रशासन को कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाने की अनुमति देता है। इसे हाई कोर्ट में एक स्टूडेंट-सोशल मीडिया ऐक्टिविस्ट ने जनहित याचिका के जरिए चुनौती दी थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने प्रतिबंध को खारिज करने की उनकी मांग को ठुकरा दिया था। इसके बाद लॉ के स्टूडेंट गौरव सुरेशभाई व्यास ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

गुरुवार को चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर और जस्टिस आर भानुमति की बेंच ने इसे खारिज करते हुए कहा, ‘यह कई बार कानून और व्यवस्था के लिए बहुत जरूरी हो जाता है।’ याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करने वाले वकील अपार गुप्ता ने दलील दी कि सेक्शन 144 के तहत प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। इसे लेकर उन्होंने इंडियन टेलीग्राफ ऐक्ट का जिक्र किया जो केवल केंद्र सरकार को विशेष साइट्स ब्लॉक करने की अनुमति देता है। लेकिन चीफ जस्टिस इससे सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा, ‘इसके साथ ही शक्तियां हो सकती हैं।’

व्यास की याचिका में दलील दी गई थी कि इंटरनेट पर राज्य सरकार का प्रतिबंध ठीक नहीं था क्योंकि इसके दायरे से ब्रॉडबैंड सर्विसेज बाहर थी। ब्रॉडबैंड सर्विसेज का इस्तेमाल भी अफवाहें फैलाने और अशांति पैदा करने के लिए किया जा सकता है। इसमें कहा गया था कि बैन मनमाना था क्योंकि इससे नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन हुआ था। याचिका के मुताबिक, इससे रिटर्न की ई-फाइलिंग, बैंकिंग जैसी बहुत सी जरूरी सर्विसेज पर भी रोक लगी थी।

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इस तरह के बैन आतंकवाद से प्रभावित जम्मू और कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में लगाए जाते हैं, लेकिन इसके लिए हाल ही में लागू किए गए इंफॉर्मेशन टेक्नॉलजीऐक्ट का इस्तेमाल किया जाता है, जो केवल केंद्र सरकार के निर्धारित अधिकारियों को शक्ति देता है। गुजरात हाई कोर्ट ने 15 सितंबर, 2015 के फैसले में राज्य के ऑर्डर के खिलाफ व्यास की याचिका खारिज कर दी थी।

हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सहित डिविजन बेंच ने कहा था कि राज्य के पास सीआरपीसी के सेक्शन 144 के तहत इस तरह का ऑर्डर जारी करने की शक्ति है। व्यास का कहना था कि राज्य कुछ साइट्स को ब्लॉक करने के लिए सेक्शन 69ए को लागू कर सकता था और वह इंटरनेट पर पूरी तरह रोक नहीं लगा सकता, जो टेलीग्राफ ऐक्ट के तहत केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।

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