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मोदी—मय भाजपा ने राजनाथ सिंह के पंख कतर डाले

कुमार सौवीर

लखनऊ। भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को यूपी सल्तनत का ताज पहना दिया है। नये मुख्यमंत्री योगी अपने मंत्रिमंडल के साथ शपथ लेने के लिए रवाना हो चुके हैं। इसके साथ ही यूपी में एक नयी रंगत का दौर शुरू हो जाएगा किसकी शुरूआत तो केसरिया रंग से पैदा हुई, लेकिन यहां पहुंचते—पहुंचते वह भगवा रंगत से छीप गयी। एमपी में उमा भारती को छोड़ कर देश के इतिहास में शायद यह पहला मौका है, जब किसी धार्मिक प्रतीक रंग—चिन्ह वाले अगुआ की किसी राज्य का मुखिया में ताज—पोशी की गयी हो।

लेकिन पिछले एक सप्ताह के बीच जिस तरह भाजपा में घटनाक्रम बीते हैं, उसमें आम भाजपाइयों में भारी उत्साह है। कहीं मिठाई, कहीं आतिशबाजी, कहीं रंग—गुलाल, कहीं बधाइयां, कहीं बाजा—ताशे, तो कहीं जहां—तहां सडकों पर जय श्रीराम का उदघोष ही सुना जा रहा है। इस जीत को पिछले लम्बे समय से उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा की आपराधिक—समर्पित अराजकता और अन्याय के असहनीय प्रशासन से मुक्ति के तौर पर देखा जा रहा है।  इसी वजह से चहुं—ओर हर्ष, उल्लास, अतिरेक, विजय—भाव और राजनीतिक सफलता का जोश, जुनून और प्रसन्नता का माहौल दिखता दिख रहा है।

लेकिन यह खुशी पूरी सारी भाजपा में ही दिख—व्यापी हो, ऐसा भी नहीं है। वजह यह कि इस सरकार के गठन की प्रक्रिया के पूरे दौरान यूपी में एकमात्र विशालतम स्तम्भ माने जाने वाले राजनाथ सिंह के खेमे को उपेक्षित ही नहीं, बल्कि अपमानित तक कर दिया गया है। कहने की जरूरत नहीं कि इस उपेक्षा का असर इस खेमे से जुडे लोगों और समर्थकों में साफ दिखने लगा है।

जो यह केवल यह मान कर चल रहे हों कि 11 मार्च के बाद से ही राजनाथ सिंह मीडिया से अचानक ही दूरी बना गये हैं, वे गलती कर रहे हैं। सच यही है कि पूरी तरह मैनेज्ड—मीडिया को साधने वालों ने इतनी घेराबंदी करा दी कि वे न अखबारों में दिखे और न ही चैनलों पर उनका चेहरा दिखा। अभी कुछ ही समय पहले तक राजनाथ सिंह मीडिया के चहेते माने जाते रहे हैं।

राजनाथ की यह चुप्पी या मीडिया से उनकी दूरी की मौजूदा हालत अकारण ही नहीं है। राजनाथ सिंह का जन्म खामोश रहने के लिए नहीं हुआ है। चाहे नक्स​लियों के अतिवाद पर सीधे सोनभद्र पहुंच कर अतिवादियों को मुंहतोड जवाब देने वाले राजनाथ की छवि यूपी में नकल के खिलाफ जेहादी जंगजू के तौर पर मानी जाती है। अपराधियों के खिलाफ जो अभियान राजनाथ ने छेडा, यूपी को अब तक याद है। वे एक कुशल प्रशासक हैं। बस यही तो क्षोभ है इस खेमे से जुडे लोगों का।

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राजनाथ सिंह ने न केवल पिछले लोकसभा में यहां से अपनी सीट भारी बहुमत से निकाली, बल्कि इस चुनाव में यहां की एक छोड कर बाकी सारी सीटें भी जिताने का दमखम दिखाया। बावजूद इसके कि लखनउ की सारी सीटों पर टिकट के वितरण में राजनाथ सिंह की एक भी नहीं मानी गयी। चाहे वह कांग्रेस से आयीं रीता बहुगुणा का मामला हो, बसपा से आये ब्रजेश पाठक का प्रकरण हो अथवा मायावती को गालियां देकर लांछित करने वाले दयाशंकर सिंह की पत्नी के पैंतरों का मामला हो। राजनाथ सिंह अपने इस चुनाव क्षेत्र की सारी सीटें भाजपा और आरएसएस के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की झोली में डालना चाहते थे। परिवारवादी परम्‍परा की बात करें तो भी पंकज सिंह का पत्‍ता काट दिया गया।

उनके खेमे के सूत्रों का कहना है कि बाहर से आये लोगों का स्वागत भाजपा में करने से उन्हें कोई गुरेज नहीं, लेकिन ऐसे बाहरी लोगों को भाजपा में आने के बाद पहले दस—पांच बरस तक संघ—भाजपा के कल्चर को एडाप्ट कराने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। यह नहीं कि किसी दूसरी पार्टी छोड कर कोई मतलबी शख्स ओछे स्वार्थ लेकर भाजपा में आये, और उसे टिकट से लेकर मंत्री पद तक सीधे सोने की तश्तरी पर परोस दिया जाए। इससे भाजपाइयों में अवसाद और असंतोष फैल सकता है।

मगर ऐसा हुआ नहीं। और नतीजा, राजनाथ सिंह को भाजपा ने आज आइसोलेशन—वार्ड में भर्ती होने जैसी हालत तक पहुंचा दिया है। नयी सरकार को अब राजनाथ की उंगली तो दूर, छांव तक की चाह नहीं। बावजूद इसके कि राजनाथ का सरकारी आवास योगी आदित्य से ही सटा है, लेकिन उनके बीच कोई तादात्म्य बन पायेगा, इसका संशय है। इतना ही नहीं, इसके बाद भाजपा के अंदर राजनाथ सिंह के भविष्य को लेकर भी चर्चाएं भी शुरू हो चुकी हैं।

सभार : मेरी बिटिया डॉट कॉम

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