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EVM पर सवाल उठाने से पहले ये रिपोर्ट पढ़ें, सब क्लियर हो जाएगा!

नई दिल्ली। विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद आज विपक्ष वोटिंग मशीन को कोस रहा है. 2009 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद बीजेपी के भी कई नेताओं ने EVM पर सवाल उठाया था. इसके लिए विदेश के कई उदाहरण भी दिए जाते रहे हैं.

2009 के चुनावों में कांग्रेस की बंपर जीत के बाद आज के बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी EVM पर सवाल उठा रहे थे. लेकिन इस बार कहते हैं कि कोई गड़बड़ नहीं हुई. सुब्रहम्ण्यम स्वामी कहते हैं कि इस बार मैंने वैरिफाई किया है. जिस तरह चिप को सील कर के रखा गया है उससे मुझे यकीन है कि यूपी में कोई गड़बड़ नहीँ हुई है.

इसके साथ ही दावा है कि बीजेपी नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन’ शीर्षक नाम से एक किताब भी लिखी थी. जब आज एबीपी न्यूज ने जीवीएल नरसिम्हा राव का ईवीएम से छेड़छाड़ के आरोपों पर पक्ष जानना चाहा, तो उन्होंने बयान देने से मना कर दिया. ऐसे में ये कह सकते हैं कि जो पार्टी जीत जाती है, उसका EVM पर भरोसा हो जाता है, जो हार जाती है, वो EVM को ही कोसने लगती है.

इन देशों में बैन है ईवीएम
हांलाकि ये बात सच है कि दुनिया के विकसित और कई विकासशील देशों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की जगह बैलेट पेपर को ही प्राथमिकता दी जाती है. जैसे नीदरलैंड में पारदर्शिता की कमी के कारण EVM बैन की गई. आयरलैंड में तीन साल की रिसर्च के बाद EVM से वोटिंग बंद हुई. जर्मनी ने EVM को अंसवैधानिक बताकर बंद किया. इटली में भी ई-वोटिंग से गड़बड़ी के शक में बंद किया गया. इंग्लैंड और फ्रांस ने कभी EVM का इस्तेमाल ही नहीं किया.

इन दूसरे देश के कारणों को आधार बनाकर ये नहीं कहा जा सकता है कि हमारे देश में भी EVM में बदलाव कर चुनावी नतीजे फिक्स किए जा रहे हैं.देश में चुनावों के दौरान पारदर्शिता लाने के लिए ही बैलेट पेपर की जगह EVM का इस्तेमाल शुरु हुआ. यूं तो देश में 1998 में पहली बार वोटिंग के लिए EVM का प्रयोग हुआ लेकिन उससे पहले बैलेट पेपर इस्तेमाल करते हैं. जिसमें चुनावी नतीजे आने में ही तीन-तीन दिन तक लग जाते थे.

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बैलेट पेपर की जगह EVM ज्यादा फायदेमंद है?

बैलेट पेपर में वोटिंग के जरिए मतों के खराब होने की आशंका ज्यादा रहती थी. EVM में वोट बर्बाद होने आशंका ना के बराबर रहती है. बैलेट पेपर से बूथ कैप्चरिंग में जहां आधे घंटे में 1000 फर्जी वोट पड़ सकते थे. EVM में बूथ कैप्चरिंग के दौरान भी आधे घंटे में कोई 150 से ज्यादा वोट नहीं डाल सकता. क्योंकि एक मिनट में पांच वोट ही EVM में पड़ सकते हैं. बैलेट पेपर काउंटिंग में जहां तीन दिन तक लग जाते थे. आज EVM से चुनावी नतीजे 3 घंटे में साफ हो जाते हैं.

चुनाव आयोग ने पहली बार पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान ऐसी EVM मशीन का भी इस्तेमाल शुरु किया है. जिसमें वोट डालते ही एक पर्ची के जरिए ये भी पता चल जाता है कि आपने जिस चुनाव चिन्ह के आगे बटन दबाया, वोट उसी को गया है कि नहीं.

कुल मिलाकर कोशिश ये होनी चाहिए कि देश में चुनाव प्रणाली को और पारदर्शी बनाया जाए. इसके लिए राजनीतिक दलों को मिलकर कोशिश करनी चाहिए. ना कि अपनी जीत पर EVM ठीक है, और अपनी हार पर EVM खराब है का आरोप लगाकर राजनीति करनी चाहिए. इसके साथ ही अगर वोटिंग मशीन से चुनावी घोटाले का कोई दावा है नेताओं के पास है तो उसे साबित करें ताकि जनता को उस सच का भी पता चले.

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