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राजेश श्रीवास्तव
पांचों राज्यों के विधानसभा चुनावों में मनमाफिक परिणाम आने के बाद भाजपा के लिए देशभर में स्थिति मजबूत होती दिख रही है। पांच में से दो राज्यों में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करने वाली भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भी परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। निश्चित रूप से इस जीत के भाजपा और राष्ट्रीय राजनीति के लिए मायने हैं। 14 साल बाद भाजपा को मिली ऐतिहासिक और प्रचंड जीत से भाजपा को सबसे बड़ा फायदा तो ये होगा की राज्यसभा में उसे अपनी स्थिति सुधारने में मदद मिलेगी। अगले साल यूपी कोटे से राज्यसभा में दस सीटें खाली होनी हैं जिन पर भाजपा आसानी से अपने उम्मीदवार जिता सकती है। एक सीट उत्तराखंड की खाली होनी है जिस पर भाजपा का दावा मजबूत होगा।

दोनों राज्यों में जीत का बड़ा फायदा ये भी मिलेगा कि इस साल के अंत में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों में भी भाजपा अपनी पसंद का उम्मीदवार जिता सकेगी। क्योंकि राष्ट्रपति चुनावों में राज्यसभा और लोकसभा के सांसदों के साथ राज्यों के विधायक भी वोट करते हैं ऐसे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे बड़े राज्यों में 35० से ज्यादा विधायकों के बूते भाजपा आसानी से अपने उम्मीदवार को राष्ट्रपति भवन तक भेज सकती है। एक बड़ा फायदा ये भी होने वाला है कि जीएसटी को अब देशभर में लागू करने में और आसानी रहेगी। क्योंकि केंद्र के साथ साथ प्रदेश सरकार को भी इसे अपने यहां लागू करना है ऐसे में दो और राज्यों में भाजपा की सरकार आने से इसकी राह आसान हो सकेगी।

देशभर में कांग्रेस मुक्त का नारा देने वाली भाजपा को एक बड़ा फायदा ये भी होने वाला है कि उसके सामने विपक्ष की चुनौती और कमजोर पड़ जाएगी। उत्तर प्रदेश में जिस तरह से सपा और कांग्रेस की हार हुई है उसका असर उनके मनोबल और संख्याबल दोनों पर पड़ेगा। इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। ऐसे में बिना मजबूत विपक्ष के केंद्र सरकार को अपने फैसले लागू करने में और आसानी होगी। इस जीत के एक बड़े मायने ये भी हैं कि दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए अभी से जमीन तैयार हो सकेगी। सीटों के हिसाब से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जिस तरह से भाजपा ने जीत दर्ज की है वो उसके लिए आने वाले आम चुनावों में भी लाभदायक होगी। लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें उत्तर प्रदेश से ही आती हैं ऐसे में भाजपा को एक यहां मजबूत गढ़ मिल सकेगा। नतीजे भाजपा के लिए भी चौंकाने वाले हैं, क्योंकि पार्टी के कुछके नेताओं को छोड़ दिया जाए, तो किसी ने भी तीन सौ सीटों का अनुमान नहीं जताया था। नतीजों ने दिखाया है कि भारतीय राजनीति में आज नरेंद्र मोदी सबसे बड़ा ब्रांड हैं और उनकी चमक बरकरार है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली ये जीत मई, 2०14 में लोकसभा चुनाव में उसे इस सूबे में मिली सीटों जैसी है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने यह चुनाव जिस तरह से लड़ा, उसकी काट विपक्ष ढूंढ नहीं सका। इस चुनाव के बाद कुछ महीने में राज्यसभा का गणित भी बदल जाएगा। इसके बाद शायद भाजपा को विपक्षी दलों की मदद की जरूरत भी न पड़े। विपक्ष की इन चुनावों में जो हालत हुई है, उसके बाद भाजपा और मोदी के समक्ष कोई बड़ी चुनौती भी नहीं होगी। आप इसे लहर कहें, सुनामी कहें या आंधी, मगर हकीकत यही है कि मोदी ने देश की राजनीति में इतनी बड़ी लकीर खींच दी है कि उसे 2०19 में विपक्ष का लांघ पाना मुश्किल है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 4०3 में से एक भी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था, इसके बावजूद उसने तीन सौ का आंकड़ा पार किया है।

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वहीं मुस्लिमों को 9० से अधिक सीटें देने वाली बसपा 2० सीटें भी हासिल नहीं कर सकी है। इस चुनाव ने दिखाया है कि नोटबंदी को लेकर आर्थिक आंकड़े चाहे कुछ भी हों, विश्लेषक चाहे कुछ कहें, इसका असर आम मतदाताओं पर नहीं पड़ा है। मोदी खासतौर से निचले तबके के मतदाताओं को यह समझाने में सफल रहे हैं कि नोटबंदी ने वह कर दिखाया है, जिसके नारे कम्युनिस्ट पार्टियां लगाती रही हैं। आखिर भाजपा नेत्री उमा भारती ने इस कदम के लिए मोदी की मार्क्स से ही तुलना कर दी थी। मगर हम सब जानते हैं कि मोदी मार्क्स नहीं हैं। मोदी मोदी हैं और उन्होंने 2००2 के बाद लंबा सफर तय किया है। मई, 2०14 ने इस देश को एक नया नेता दिया था, तो उत्तर प्रदेश के चुनाव ने दिखाया कि वह नेता कितना आदमकद है। वास्तव में इन नतीजों ने मोदी पर कहीं अधिक बोझ लाद दिया है।

इसमें भला क्या शक करना कि वह आज देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन क्या उन्हें जैसा कि अंग्रेजी का एक शब्द है (जिसके बराबर का हिदी का शब्द नहीं मिलता) ‘स्टेट्समैन’कहा जा सकता है? मोदी का महिमामंडन करने वाले ऐसा कह सकते हैं, लेकिन मोदी ने अभी तक स्टेट्समैन जैसा व्यवहार नहीं किया है। सपा-कांग्रेस गठबंधन की इस चुनाव में जो हालत हुई है, उसके बाद सपा के भीतर अखिलेश के खिलाफ आवाज उठनी शुरू हो गई हैं। बेशक, अखिलेश के पास अभी उम्र है, मगर 2०19 से पहले हुआ ये सेमीफाइनल मैच हार चुके हैं। 2० से भी कम सीटें मिलने के कारण मायावती भी उस स्थिति में नहीं रह गई हैं, जो विपक्षी एकता की धुरी बन सकें। इस चुनाव में सर्वाधिक नुकसान किसी का हुआ है, तो वह हैं मायावती। मई, 2०14 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में उसे हुए नुकसान की भरपाई तो और मुश्किल है। वह विपक्ष की गोलबंदी के विमर्श में अब शायद ही कोई अहम भूमिका निभा सकें।

इन चुनावों ने यह भी साफ कर दिया है कि सपा-बसपा और कांग्रेस को यह फिर से विचार करना होगा कि वह कौन सा मुद्दा लेकर जनता के बीच जायें कि जनता उन्हे सुनने-समझने को तैयार हो। क्योंकि इन चुनावों में न काम बोला, न ही मुस्लिम-दलित समीकरण। दरअसल इस पूरे चुनाव का अगर ठीक से आंकलन किया जाये तो यह भी तस्वीर साफ होती है कि अखिलेश ने काम बोलता है का नारा जरूर दिया लेकिन कोई काम उनका पूरा नहीं हो सका। आधारशिला रखना या फिर शिलान्यास या फिर आध्ो-अधूरे कामों का उद्घाटन कर देने से काम की इतिश्री नहीं हो जाती। इन कामों में से एक भी काम वह पूरा नहीं कर पाये। न एक्सप्रेस वे पूरा हुआ, न मेट्रो चली और न ही लोगों को रोजगार मिला। ऊपर से गायत्री प्रजापति जैसे प्रकरण और परिवार की कलह ने उनकी और भद पिटवायी। गायत्री प्रजापति प्रकरण से शुरू हुई कलह चुनाव के सातवें चरण तक जारी रही लेकिन मुख्यमंत्री ने उनसे किनारा नहीं किया। इसका भी खूब असर हुआ। वहीं मायावती ने मुस्लिम राग ऐसा अलापा कि हिंदू धर्म की कोई भी बिरादरी हो उनसे छिटक कर दूर जा गिरी। उनको भी समझना होगा कि अभी वह हिंदुस्तान में ही चुनाव लड़ रही हैं।

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