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खूनी राजनीति का लेफ्ट-राइट !

नई दिल्ली। धर्म और जातियों के घमासान पर आधारित उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रचार थम चुका है. लेकिन देश का एक राज्य ऐसा है, जहां इन दिनों खूनी राजनीति का लेफ्ट-राइट हो रहा है. किसी के हाथ पैर काटे जा रहे हैं. कोई बम से उड़ा दिया जा रहा है. कोई घर में घेरकर मौत के घाट उतारा जा रहा है. यूं तो राजनीति का ये रक्तचरित्र देश के दक्षिणी राज्य केरल में दिख रहा है. लेकिन दिल्ली तक इस खूनी राजनीति के लेफ्ट-राइट की धमक है.

तारीख- 2 मार्च
जगह- केरल के कोझिकोड में संघ मुख्यालय
अचानक बम से हमला होता है. आरोप सीपीएम के कार्यकर्ताओं पर लगता है.

तारीख- एक मार्च
जगह- उज्जैन
संघ के प्रचार प्रमुख रहे कुंदन चंद्रावत सीपीएम नेता और केरल के मुख्यमंत्री विजयन का सिर काटकर लाने वाले को एक करोड़ इनाम देने की बात करते हैं.

अपने इसी बयान के कारण कुंदन चंद्रावत संघ में सभी पदों से हटाए जा चुके हैं. लेकिन केरल में संघ और लेफ्ट के कार्यकर्ताओं की हिंसक झड़प को लेकर नई बहस शुरु हुई है. संघ और बीजेपी के तमाम नेता पूछ रहे हैं कि हमारे कार्यकर्ता से गलती हो तो असहिष्णुहता, लेकिन लेफ्ट वाले सौ खून भी कर दें तो माफी क्यों?

बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने कहा कि 10 महीने के भीतर 14 लोगों की हत्या की जा चुकी है, हाथ पैर काटे जा चुके हैं, कई सौ मकान जलाए जा चुके हैं, पूरा देश चुप कैसे है, देश में सोचने वाला वर्ग क्या सोया है, क्या असहिष्णुता के नाम पर हत्याएं नहीं दिख रहीं?

ये बयान सुनकर आपको भी लग सकता है कि देश में अगर वामपंथियों पर संघ कार्यकर्ताओं के कत्ल के आरोप लग रहे हैं तो हल्ला क्यों नहीं हो रहा है ? देश में अगर संघ कार्यालय में बम फूटता है, आरोप सीपीएम पर लगता है तो असहिष्णुता की बहस क्यों नहीं हो रही ?

राष्ट्रवाद की देशद्रोह की बहस के बीच क्यों केरल की खूनी हिंसा पर चर्चा भी नहीं होती ? इसीलिए आज एबीपी न्यूज़ ने कुछ खास जानकारियां आपके लिए रिसर्च करके निकाली हैं. ये सच पता करने की कोशिश की है कि आखिर केरल में संघ और लेफ्ट की खूनी राजनीति का सच क्या है ? क्या वामपंथियों के गढ़ में दक्षिणपंथ की सियासत करने वालों को चुनचुनकर मारा जा रहा है ?

देश का जो राज्य केरल साक्षरता दर के मामले में सबसे अव्वल है. आखिर लेफ्ट के उस गढ़ में सियासत एक दूसरे के खून की प्यासी क्यों हो जाती है? खासकर केरल के कन्नूर जिले में. जहां हाल में ही संघ और लेफ्ट के कार्यकर्ताओं के कत्ल और हमले की वारदातें बढ़ी हैं. यहां की खूनी राजनीति का लेफ्ट-राइट का सच हमने खंगाला तो पता चला कि केरल में जितनी राजनीतिक हत्याएं हुई हैं, उसमें से अकेले 36 फीसदी सियासी मर्डर कन्नूर जिले में हुए हैं. केरल के कन्नूर जिले में पिछले 16 साल में संघ और सीपीएम के कार्यकर्ताओं के कत्ल की वारदात लगभग बराबर रही हैं. कन्नूर पुलिस ने एक RTI के जवाब में बताया है कि 16 साल में अगर कन्नूर में RSS-बीजेपी के 31 कार्यकर्ताओं का कत्ल हुआ तो इन्हीं 16 साल में कन्नूर में सीपीएम के भी 30 वर्कर मौत के घाट उतारे गए हैं. इसीलिए संघ-बीजेपी और लेफ्ट के नेता एक दूसरे पर हिंसा करने का आरोप लगा रहे हैं.

आरएसएस कार्यकर्ताओं पर हुए हमले ने संघ को पहली बार सड़क पर उतरने के लिए मजबूर किया है. देश के अलग अलग हिस्सों में लगातार संघ और संघ से जुड़े संगठन प्रदर्शन कर रहे हैं. लेफ्ट पर हिंसा प्रायोजित करने का आरोप लगा रहे हैं. इसलिए अब ये समझना जरूरी हुआ कि क्या लेफ्ट के शासनकाल में ही राजनीतिक हिंसा बढ़ जाती है.

केरल के कन्नूर में 16 साल के दौरान राजनीतिक हत्याओं का आंकड़ा देखने पर पता चलता है कि ये खूनी राजनीति लेफ्ट की सरकार आते ही बढ़ी है. जैसे साल 2000 और 2006-2011 के बीच लेफ्ट की सरकार रहने के दौरान ज्यादा हत्याएं हुईं.

यही वजह है कि संघ विचारक राकेश सिन्हा वामपंथियों पर एक नया आरोप लगाते हैं. राकेश सिन्हा बताते हैं कि बहुमत में होते हैं तो हिंसा का रास्ता अपनाते हैं, अल्पमत में रहते हैं तो अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं.

अब ये समझना जरूरी हो रहा था कि आखिर क्या वजह है कि केरल में मर्डरराज पसरा हुआ है. इस बात को समझने के लिए हम वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन के पास पहुंचे. उन्होंने विचारधाराओं की लड़ाई को जिम्मेदार बताया.

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वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन बताते हैं कि विचार कुछ नए हैं, जिनको लेकर टकराव हो रहा है. हमारा विचार तुम्हारे विचार से श्रेष्ठ है. विचारधारा के बीच वर्चस्व की जंग कैसे कत्लेआम में बदल गई, इसे समझने के लिए कुछ आंकड़ें हमने जुटाए.

कई दशकों से कन्नूर सीपीएम का गढ़ रहा है. खुद मुख्यमंत्री विजयन कन्नूर से ही आते हैं. लेकिन पिछले एक दशक में केरल और खासकर कन्नूर में आरएसएस ने अपने पैर तेजी से फैलाए हैं. जानकारी मिली कि गुजरात जैसे राज्य में संघ की 3000 शाखाएं ही चल रही हैं. वहीं केरल में आरएसएस की अब करीब 4600 शाखाएं चलने लगी हैं. सीपीएम के गढ़ कन्नूर में संघ की सबसे ज्यादा शाखाएं चलती हैं. जबकि सीपीएम अपनी 30 हजार ब्रांच कमेटियों के दम पर जोड़ता है.

यही वजह है कि कन्नूर समेत केरल के दूसरे हिस्सों में विचारों की लड़ाई ने राजनीतिक हिंसा को सियासी संस्कृति के तौर खतरनाक तरीके से स्थापित कर दिया है. केरल में एक कार्यकर्ता मरता है तो उसका स्मारक बनता है. पार्टी उसे शहीद की तरह दिखाती है. विचाधारा और वर्चस्व की ये लड़ाई अब संघ की 4600 शाखाओं और सीपीएम की 30 हज़ार ब्रांच कमेटियों के बीच जारी है. इसका अंत कब, कहां, कैसे होगा, फिलहाल इसका जवाब कोई नहीं देता.

संघ के विराग पचपोरे बताते हैं कि कम्युनिस्टों का हिंसा में ही भरोसा है. पिछले आठ महीनों से जो हिंसक वारदातें हो रही हैं कि अब समय आ गया है कि बड़ी एजेंसी को जांच करनी चाहिए. संघ विचारक राकेश सिन्हा ने कहा कि केरल की सरकार मार्क्सवादी गुंडों को प्रोत्साहित कर रही है, संघ के लोगों पर हमले के लिए, राष्ट्रपति शासन लगाया जाए, केरल के मुख्यमंत्री खुद जिम्मेदार हैं.

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि वामपंथी साथियों को समझना चाहिए, जैसे वो कर रहे हैं, प्रतीक है कि उनका लोकतंत्र में विश्वास नहीं है, वो डंडा तंत्र और अराजकता, क्राइम पर वो भरोसा करते हैं.

राजनीति के जानकार ये भी बताते हैं कि केरल में लेफ्ट-राइट की खूनी सियासत की एक वजह बीजेपी का तेजी से आगे बढ़ना है. 2016 के विधानसभा में केरल में बीजेपी ने दस फीसदी वोट हासिल किए और एक सीट भी जीती थी. संभव है कि विचारों की रक्तरंजित राजनीति इसीलिए और बढ़ी है. इसलिए सवाल उठता है कि “God’s own country कहे जाने वाले केरल में क्या हिंसा रोकी नहीं जा सकती?

कुछ दिनों पहले केरल में जब संघ के स्वयंसेवक अपने नए गणवेश में पथ संचलन करते निकले थे, तब पुलिस को सुरक्षा इंतजाम करने में पसीने छूट गए थे. वजह थी राज्य की खूनी राजनीति का इतिहास. जो वामपंथ शासित केरल में नहीं बल्कि बल्कि वामपंथियों के दूसरे गढ़ पश्चिम बंगाल में खूब खून बहाती है. देश में अगर राजनीतिक हत्याओं की बात करें तो केरल और पश्चिम बंगाल ये दो ऐसे राज्य हैं, जो राजनीतिक रंजिश में होने वाली हत्याएं सबसे ज्यादा हैं. 2012 में राजनीतिक रंजिश में हुई हत्याओं के मामले में पश्चिम बंगाल तीसरे और केरल पांचवें नंबर पर था. 2013 में पश्चिम बंगाल पहले नंबर पर था केरल चौथे नंबर पर. 2015 में केरल तीसरे नंबर आ गया.

उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे बड़े सियासी राज्य में अगर राजनीतिक हत्याएं होती हैं तो उसके पीछे वजह विचारधारा नहीं होती. लेकिन वामपंथी जड़ों वाले राज्य पश्चिम बंगाल और केरल में सियासी हिंसा के पीछे वजह क्यों विचारधारा बनती है. क्या इसके पीछे एक कारण दोनों पक्षों की काडर वाली राजनीति भी है ?

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन बताते हैं कि विचार मानने वाले तर्क छोड़ देते हैं. कैडर हो जाएं. जो तर्क करना बंद कर दें. वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने जो हमें बताया उसके मुताबिक तो यही बात लगती है कि कार्यकर्ता चाहे संघ का हो या फिर लेफ्ट का. वो अपनी विचारधारा के लिए कुछ भी करना चाहता है. लेकिन फिर ये हिंसा कैसे रोकी जा सकती है? अरविंद मोहन बताते हैं कि कानून व्यवस्था अगर राज्य का मसला है तो रोकने की जिम्मेदारी भी राज्य सरकार की होगी.

कुल मिलाकर तस्वीर ये है कि एक तरफ लेफ्ट है. जो अब सिमटकर केरल में बचा है. दूसरी तरफ संघ-बीजेपी जो पूरे देश में फैलने के बाद केरल में झंडा बुलंद करना चाहती है. और वैचारिक छुआछूत ने कट्टरवादी राजनीति को ऐसा बढ़ावा दिया है कि सियासी वर्चस्व के लिए कार्यकर्ता कुर्बान किए जा रहे हैं.

सीपीआई नेता डी राजा ने कहा कि आरएसएस के नेता ही भड़काऊ बयान देते हैं…हिंसा के लिए भड़काने का काम आरएसएस ही करता है.जेडीयू नेता के सी त्यागी ने कहा कि कम्युनिस्ट सरकार को हटाने में साजिश हो रही है, इसलिए सीपीएम और संघ के कार्यकर्ताओं में हिंसक घटना घट रही है.

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