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मीडियाः एक चेहरा यह भी

मनोज दुबे 

यूपी में नये सरकार के  गठन की तारीखों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। सैफई वाले पापा अपने बेटे से हार मानकर मुलायम पड़ गये हैं। ऐसे में चाचा की चिंताएं स्वाभाविक है। खैर जो भी हो… अब समाजवादी पार्टी के परेशान रोते-धोते कार्यकर्ताओं के चेहरे पर हंसी खिलखिलाई है वहीं अगली बार की विधायकी बरकरार रखने के लिए अन्य पार्टियों के दरवाजे पर लाइन लगाये कुछ पार्टी विधायकों की भी ‘अखिलेश में ही आस्था’ दिखने लगी और वो उलटे पांव अपने दरवाजे पहुंच गये। राजनीति में पाला बदल कोई अनहोनी नहीं मानी जाती लेकिन सैद्धान्तिक रूप से ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ के ढब पर चलने का दावा करने वाले मीडिया में भी ‘बंदरकूद’ की तैयारी दिखायी पड़ना बहुत ही दिलचस्प है। कल तक जो स्वनामधन्य ‘वरिष्ठ पत्रकार’ और तथाकथित संपादक होर्डिंगों और बैनरों में मुख्यमंत्री के साथ नजर आने और इस तरह नौकरशाही पर धाक और लोगों के बीच धमक जमाने को पत्रकारिता का परम और एकमात्र उद्देश्य मानकर चल रहे थे, उन्होंने रातों-रात युवा मुख्यमंत्री रूपी कवच उतार फेंक छलांग लगाने की मुद्रा में सही वक्त का इंतजार करने लगे हैं। 11 मार्च को ऊंट जिस करवट बैठेगा, ये कपि शूर उसी ओर कूद पड़ेंगे और अपनी क्रांतिकारी पत्रकारिता को नए रंग में रंग लेंगे। हालांकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के शासनकाल में ऐसे पत्रकारों की पत्रकारिता का हश्र जो भी रहा हो… बल्कि ये पत्रकारगण बेशक खूब फले-फूले हैं।
चुनाव की ऋतु आती है तो मीडिया जगत में कुकुरमुत्तों की बाढ़ भी आती ही है। यह बात अलग है कि इनमें से कुछ मशरूम बनकर तश्तरियों में सज जाते हैं तो कुछ चुनावी नमी के सूखते ही मुरझाकर गिर जाते हैं। इसलिए कोई ताज्जुब नहीं कि कोई खबरों का पता बदलने की बात कर रहा है तो कोई जनता को सबसे पहले ‘खबरदार’ करने का दावा कर रहा है। यूपी के शहरों में तमाम प्रमुख चैराहों और नुक्कड़ों पर लगी होर्डिंग और उन पर सजे मुस्कुराते चेहरे यह बताते हैं कि वह जमाना चला गया जब लोकतंत्र के चैथे खम्भे की ताकत कलम में बसती थी, अब कलम नहीं चेहरा महत्वपूर्ण हो गया है। कलम दिखती नहीं, चेहरा दिखता है और जो दिखता है वही चलता है और चाल सही रहे तो चमकता भी है।
मीडिया की चाल और उसका चरित्र किस कदर बदल गये हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस चुनावी मौसम में जनजीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दे दफन होकर रह गये हैं और सारा फोकस सैफई कुनबे की कलह जैसे मुद्दों पर आकर टिक गया है। सूबे की सत्ता पर काबिज यादव परिवार की आपसी जंग को मीडिया ने जनता के लिए मुद्दा बनाकर पेश करने में क्या कोई कोर-कसर छोड़ी थी? मीडिया को न नोटबंदी की चोट से किसानों-मजदूरों की टूटती कमर दिखायी पड़ रही है, न रोज-ब-रोज बेइज्जत होती महिलाएं नजर आ रही हैं, न करोड़ों खर्च करके ‘सक्षम’ बनायी गयी पुलिस की ‘सी.सी.टी.वी. फुटेज खंगालने’ वाली मुस्तैदी का छल दिखलायी पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट के धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगने की मुमानियत वाले आदेश के बावजूद यूपी की राजनीति में चल रहे जाति-धर्म के गोरखधंधे की बारीकियों से जनता को अवगत करवाने और उसे नकारने को प्रेरित करने का काम क्या मीडिया को नहीं करना चाहिए? क्या मीडिया का काम यह नहीं है कि वह लोगों को यह भी बताये कि उन्हें वोट के हथियार का इस्तेमाल करने में क्या सावधानी और सतर्कता बरतनी चाहिए?
लेकिन मीडिया यह सब क्यों करे? पत्रकारिता अब विशुद्ध धंधा है और धंधे में निगाह नफा-नुकसान पर रहती है न कि धंधे के तौर-तरीकों पर।
यह सब लिखने का मकसद किसी सहयोगी-साथी को चोट पहुंचाना नहीं है बल्कि एक कड़वी सच्चाई को सामने लाना और कुछ सोचने पर मजबूर करना है।

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