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सियाचिन: माइनस 55 डिग्री में 6 दिन चला रेस्क्यू ऑपरेशन, कैसे जिंदा रहा जवान?

siachen7नई दिल्ली। सियाचिन में पिछले दिनों आए एवलांच के बाद यह मान लिया गया कि हादसे में सभी 10 जवानों की मौत हो चुकी है। लेकिन अपने साथियों को ढूंढने के लिए 150 जवान 20500 फीट की ऊंचाई पर माइनस 55 डिग्री टेम्परेचर में डटे रहे। दो खोजी डॉग्स और भारी भरकम आइस कटिंग मशीनों को लेकर वे इंच दर इंच जवानों को तलाशते रहे। 6 दिन बाद लांस नायक हनुमनथप्पा को जिंदा बचाया गया।
25 फीट बर्फ के नीचे फाइबर टेंट ने बचाई लांस नायक की जान…
– कई घंटों तक 25 फीट बर्फ हटाने के बाद हनुमनथप्पा तक रेस्क्यू टीम पहुंची।
– दरअसल, हनुमनथप्पा आर्कटिक टेंट के अंदर थे। यह फाइबर से बना झोपड़ीनुमा टेंट होता है जो आपको जिंदा रखता है।
– लेकिन हनुमनथप्पा 120 घंटे से वहां थे। उनकी बॉडी में ऑक्सीजन नहीं पहुंच पा रही थी।
– वे बेहोशी की हालत में मिले। उनकी पल्स नहीं मिल रही थी।
– जम्मू- कश्मीर से दिल्ली लाए जाने के बाद उन्हें आर्मी रेफरल हाॅस्पिटल में भर्ती कराया गया है।
– यहां उनकी हालत नाजुक है। अगले 24 से 48 घंटे क्रिटिकल हैं। वे कोमा में हैं।
– उनका हालचाल जानने के लिए मंगलवार को पीएम नरेंद्र मोदी भी पहुंचे।
कब आया था एवलांच?
– 3 फरवरी को सियाचिन आर्मी कैम्प के पास सुबह साढ़े आठ बजे के करीब एवलांच आया था।
– अपने बेस कैम्प से पैट्रोलिंग के लिए निकले एक जेसीओ समेत 10 जवानों का ग्रुप बर्फ के नीचे दब गया था।
– दरअसल, ग्लेशियर से 800 x 400 फीट का एक हिस्सा दरक जाने से एवलांच आया था।
– यह हिस्सा ढह जाने के बाद बर्फ के बड़े बोल्डर्स बड़े इलाके में फैल गए।
– इनमें से कई बोल्डर्स को तो एक बड़े कमरे जितने थे।
– इसी के बाद शुरू हुआ दुनिया के सबसे ऊंचे बैटलफील्ड सियाचिन ग्लेशियर में 19500 फीट की ऊंचाई पर रेस्क्यू ऑपरेशन।
आर्मी ने कैसे चलाया रेस्क्यू ऑपरेशन?
– आर्मी ने 150 जवानों को 20500 फीट की ऊंचाई पर रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए तैनात किया।
– इनके साथ दो स्निफर डॉग्स ‘डॉट’ और ‘मिशा’ भी थे।
– आर्मी के सामने चैलेंज यह था कि उसे 800 x 1000 मीटर के इलाके में इंच दर इंच सर्च करना था।
– यहां 30 फीट तक ब्लू आइस जम चुकी थी। यह क्रॉन्क्रीट से भी ज्यादा सख्त होती है।
– सियाचिन के बेहद मुश्किल मौसम को झेलने के लिए ट्रेन्ड जवानों ने चौबीसों घंटे सर्च जारी रखी।
– दिन में टेम्परेचर माइनस 30 डिग्री और रात में माइनस 55 डिग्री चला जाता था।
– इसके बावजूद जवान और दोनों खोजी डॉग डॉट एंड मिशा ऑपरेशन में लगे रहे।
ऑपरेशन में कैसे मिली तकनीकी मदद?
– आर्मी ने इतनी ऊंचाई पर पेनिट्रेशन रडार भेजे जो बर्फ के नीचे 20 मीटर की गहराई तक मैटेलिक ऑब्जेक्ट्स और हीट सिग्नेचर्स पहचान सकते हैं।
– एयरफोर्स और आर्मी एविएशन हेलिकॉप्टर के इस्तेमाल में लाए जाने वाले रेडियो सिग्नल डिटेक्टर्स भी भेजे गए। इनसे ऑपरेशन में मदद मिली।
– तेज हवाओं के चलते बार-बार रेस्क्यू ऑपरेशन में अड़चनें आईं। छठे दिन हनुमनथप्पा मिल गए। बाकी 9 जवानों के शव भी मिले।
– दरअसल, स्निफर डॉग्स उस लोकेशन पर आकर रुक गए जहां हनुमनथप्पा फंसे हुए थे।
– हीट सिग्नेचर्स ट्रेस करने वाले पेनिट्रेशन रडार ने भी यही लोकेशन ट्रेस की।
– इसके बाद बर्फ को ड्रिल करने काम शुरू हुआ।
धरती पर सबसे ऊंचाई पर मौजूद हेलिपैड से भेजे गए हनुमनथप्पा
– लांस नायक को बाहर निकालते ही धरती में सबसे ऊंचाई पर मौजूद सेल्टोरो रिज हेलिपैड से रवाना किया गया।
– अच्छी बात यह थी हनुमनथप्पा के शरीर पर जख्म के निशान नहीं थे। ऐसा होता तो खून बहने या जम जाने से उन्हें ज्यादा नुकसान हो सकता था।
– लेफ्टिनेंट जनरल एसके पटयाल ने बताया कि हनुमनथप्पा का बचना किसी चमत्कार से कम नहीं है। हम एक बार में 30 मिनट से ज्यादा ऑपरेशन नहीं चला पा रहे थे। फिर भी टीम डटी रही।
आर्मी के लिए क्यों बेहद अहम है सियाचिन?
– हिमालयन रेंज में मौजूद सियाचिन ग्लेशियर वर्ल्ड का सबसे ऊंचा बैटल फील्ड है।
– 1984 से लेकर अबतक करीब 900 जवान शहीद हो चुके हैं। इनमें से ज्यादातर की शहादत एवलांच और खराब मौसम के कारण ही हुई है।
– सियाचिन से चीन और पाकिस्तान दोनों पर नजर रखी जाती है। विंटर सीजन में यहां काफी एवलांच आते रहते हैं।
– सर्दियों के सीजन में यहां मिनिमम टेम्परेचर माइनस 50 डिग्री (माइनस 140 डिग्री फॉरेनहाइट) तक हो जाता है।
– जवानों के शहीद होने की वजह ज्यादातर एवलांच, लैंड स्लाइड, ज्यादा ठंड के चलते टिश्यू ब्रेक, एल्टीट्यूड सिकनेस और पैट्रोलिंग के दौरान ज्यादा ठंड से हार्ट फेल हो जाने की वजह होती है।
– सियाचिन में फॉरवर्ड पोस्ट पर एक जवान की तैनाती 30 दिन से ज्यादा नहीं होती।
– यहां आर्मी का हर दिन का खर्च 5 करोड़ रुपए होता है।
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