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मीडिया भूल गई, यूपी के लोग नहीं भूलेंगे बीते 5 साल!

दीपक शर्मा वरिष्ठ पत्रकार

अगस्त 2013 की एक रात जब यूपी के मुज़फ्फरनगर जल रहा था तब जातिगत आधार पर शहर से डीएम और एसएसपी को एक फ़ोन पर एक साथ हटा दिया गया। अगले तीन घंटों में नए अफसरों के हवाले एक जलता हुआ शहर सुपुर्द कर दिया गया। अगली सुबह तक नफरत की धधकती आग कई लाशें निगल गई। कुछ ऐसा ही खौफनाक हादसा जून 2016 को मथुरा में देखने को मिला। अंतर सिर्फ इतना था की यहाँ जातिगत फैसले की जगह मुद्दा ज़मीन पर कब्ज़े का था। लाशों के ढेर यहाँ भी लगे।

इन खौफनाक हादसों से बढ़कर जुर्म के निशान और भी थे। कोतवालियों में घुसकर कहीं थानेदार मारे गए तो कहीं जिलाधिकारी की नाक के नीचे घरों पर कब्ज़े हुए। करोड़ों रुपए के खनन माफिया का खेल तो विक्रमादित्य मार्ग के बंगले से चल रहा था। गायत्री प्रजापति तो बस मोहरा था। अगर आपकी जेब में पचास लाख रुपए थे तो आपको सिंचाई विभाग की मलाईदार कुर्सी मिल सकती थी। अगर आप नोएडा और ग्रेटर नोएडा को लूटकर अरबों की घूस सरकार से साझा कर सकते थे तो भले ही आप मायावती के नज़दीकी रहे हों आपको यादव राज में भी चीफ इंजीनियर बनाया जा सकता था। आप मायावती के प्रमुख सचिव रहे हों तो कोई बात नहीं, अगर आप सड़क के ठेकों से अंधी कमाई का फार्मूला जानते थे तो लखनऊ में 5 कालिदास मार्ग में आपको परमानेंट दफ्तर एलॉट हो सकता था।

और हाँ, मुख़्तसर सी एक बात तो रह गई। मुग़ल शासन के 300 साल बाद, पहली बार देश ने देखा कि गद्दी को लेकर घरों में तलवारें कैसे खिंचती हैं। सत्ता को लेकर मंच पर हाथापाई कैसे होती है और बाप, बेटे, चाचा और भाई सड़कों पर एक-दूसरे की पगड़ियां कैसे उछालते हैं। 300 साल पहले हमने रजवाड़ों की ये रंजिश आगरा के मुग़लों में देखी थी और आज आगरा से 300 किलोमीटर दूर लखनऊ के कालिदास मार्ग पर यादव वंश में देखने का ‘सौभाग्य’ मिला।

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2-2 लाख की पगार उठाने वाले टीवी एंकर तो ये मंज़र भूल ही गए। अख़बारों के मालिकों ने भी 150 करोड़ के विज्ञापन के आगे मुख्य पृष्ठ की सुर्ख़ियों गिरवी रख दीं। लेकिन क्या यादव और मुसलमान वोटरों को छोड़कर यूपी के सारे मतदाता ये मंज़र भूल गए? खैर, इस यक्षप्रश्न के उत्तर के लिए हमे 11 मार्च तक रुकना होगा।

लेकिन राजनीतिक पंडितों से मेरा एक सवाल है?
क्या गठबंधन करने से पाप धुल जाते हैं?
अगर नही धुलते…
तो फिर सच बोलिये…
ज़ुबान पर सच
दिल में इंडिया

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