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अपनी जमीन पर आतंकियों को नहीं होने देंगे दफन, बहुत हुई मिलिटेंसी : सरपंच

srinagar9नई दिल्ली। साउथ कश्मीर का बारामुला जिला एक बार फिर चर्चा में है। अक्सर आतंकी घटनाओं को लेकर रहता है, लेकिन इस बार वजह बिल्कुल जुदा है। इस बार यह इलाका इसलिए चर्चा में है क्योंकि एक जोरदार आवाज उठी है, जो मिलिटेंसी यानी आतंकवाद के खिलाफ है। बीते शुक्रवार को बारामुला जिले के एक गांव त्रिकंजन ने जो मिसाल की है वो घाटी के मिजाज से बिल्कुल अलहदा है। गांव वालों ने शुक्रवार को अपने यहां लश्कर के 3 आतंकियों की लाश दफन करने से इनकार कर दिया। जम्मू-कश्मीर के लिए ये बिल्कुल नई घटना है, क्योंकि पहले इस तरह का इनकार देखने को नहीं मिलता था।
पिछले हफ्ते बांदीपोरा इलाके में मुठभेड़ के बाद सुरक्षाबलों ने लश्कर के 3 आतंकियों को मार गिराने का दावा किया था। उन्हीं तीनों की लाश दफनाई जानी थी। नवभारत टाइम्स ने इस संबंध में त्रिकंजन गांव के सरपंच राजा शाहिद से बात की। राज शाहिद खुद 27 साल के हैं। शायद वे घाटी के सबसे युवा सरपंचों में से एक हैं। करीब 3500 की आबादी वाले गांव का प्रतिनिधित्व करने वाले राजा शाहिद दो टूक लहजे में कहते हैं कि अब वे लोग किसी कीमत पर मिलिटेंसी को बढ़ने नहीं देंगे। राजा शाहिद ने बताया कि किन वजहों से गांव वालों ने आतंकियों की डेड बॉडी को वहां दफन नहीं होने दिया।

पीर पंजाल पहाड़ी के साथ सटा यह गांव त्रिकंजन सैलानी स्पॉट हो सकता है। धरती के जन्नत का यह हिस्सा शांत है। यहां के बाशिंदों को शांति पसंद भी है। लेकिन सरहद से केवल पांच किलोमीटर दूर इस गांव की शांति कभी भी टूट सकती है, ऐसी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। सरपंच राजा शाहिद बताते हैं कि इसीलिए वे ज्यादा सतर्क हैं।

उन्होंने कहा, ‘पुलिस वालों का क्या है। एनकाउंटर के बाद खून से लथपथ शरीर लेकर आते हैं। हमारे गांव में भी नौजवान हैं। खून देखकर उनकी भावनाएं भड़क सकती हैं। भड़कती भी हैं। सरहद के बिल्कुल नजदीक हैं हम। अगर युवा रास्ता बदलकर सरहद पार जाने की सोचने लगे, तो आप क्या करेंगे। यही वजह है कि हमने उनकी (लश्कर के आतंकियों की) मिट्टी यहां दफन नहीं होने दी।’

राजा शाहिद ने बताया, ‘शुक्रवार को पुलिस वाले 3 लाश लेकर गांव आए थे। वे जेसीबी से खुदाई करवाने लगे। हमने गांववालों के साथ मिलकर इसका विरोध किया। उन्हें लाश लेकर वापस लौटना पड़ा।’ सरपंच राजा शाहिद आज ये बातें कह रहे हैं लेकिन पहले भी यहां इस तरह से लाशें दफन होती आई हैं। जब इस मामले में शाहिद से पूछा गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि हां पहले ऐसे लोग दफन किए गए थे।

राजा शाहिद का कहना है कि अब वे यहां ऐसा नहीं होने देंगे। इस मामले में सभी एकजुट हैं। उनके गांव त्रिकांजल के पास ही एक गांव है चहल। उन्होंने बताय़ा कि पहले तो वहां भी इस तरह की लाशें दफन की जाती थीं। लेकिन अब उधर से भी विरोध की आवाजें उठने लगी हैं।

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घाटी में पत्थरबाजी आम है। पूरे हफ्ते नहीं, तो जुमे के दिन यानी शुक्रवार को पत्थर चलने ही हैं। श्रीनगर में भी चलते हैं। युवा सरपंच राजा शाहिद इसकी वजह भी बताते हैं। उनका कहना है कि हमारे हुक्मरानों ने नौजवान पीढ़ी के लिए रोजगार की व्यवस्था की ही नहीं है। आज उनके हाथ रोजगार में व्यस्त होते तो वे पत्थर नहीं चलाते।

हालांकि एक वर्जन राजा शाहिद के अलग भी है। स्थानीय मीडिया की रिपोर्टिंग के मुताबिक आतंकियों के लाश को दफन नहीं करने देने के पीछे एक दूसरी वजह भी है। इसके मुताबिक जब शुक्रवार को पुलिस वाले 3 लाशों के साथ पहुंचे तो लोगों ने विरोध किया। लोगों का कहना था कि उन्हें पता ही नहीं है कि जिन लोगों को आतंकी बताकर मारा गया है, वो कौन हैं? उनका धर्म क्या है? वो आतंकी हैं भी या नहीं? यही वजह है कि लोगों ने उनको यहां दफन नहीं होने दिया है।

सरपंच राजा शाहिद

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