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….तो CM “अखिलेश’ के लिए “संकटमोचक” बन गये “मुलायम’

लखनऊ।  उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार इन दिनों अपने ही कुनबे के सियासी घमासान में व्यस्त है. आलम ये है कि दोनों तरफ से बराबर सुलह की नाकाम कोशिशें हो रही है. पर इस बीच एक सच यह भी कि अगर समाजवाद के कुनबे ने ये सियासी संग्राम ना छिड़ा होता तो CM अखिलेश को इन तीन सवालों का जवाब देते न बनता. वो  बढ़ते अपराध, गुंडागर्दी, जातिवाद और सांप्रदायिक तनाव के मसले पर वे घिरे होते। लेकिन अखिलेश सरकार की नाकामियों और उपलब्‍धियों पर चर्चा करने की जगह विपक्ष, मीडिया और जनता का ध्‍यान परिवार की लड़ाई पर लगा हुआ है। कोई भी विपक्षी पार्टी सपा को उन मसलों पर घेर नहीं पा रही है, जिनका सरोकार आम आदमी से था।

जानकारों का कहना है कि अखिलेश यादव के चुनावी रणनीतिकार स्‍टीव जॉर्डिंग ने ऐसी रणनीति बनाई है कि लोगों का ध्‍यान असल मसलों से हट गया है। कमोबेश यह भाजपा की रणनीति की तरह है कि असल मुद्दों पर बात उठने से पहले कोई ऐसी बात शुरू कर दो कि सबका ध्‍यान उससे हट जाए। जानकार बताते हैं कि जॉर्डिंग की रणनीति ने ही सभी को असल मुद्दों से भटका रखा है। यही नहीं उन्‍होंने परिवार के झगड़े के बहाने अखिलेश की छवि एक प्रोग्रेसिव और साफ-सुथरे नेता के रूप में गढ़ दी है।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पोलिटिकल साइंस के प्रोफेसर एचके शर्मा कहते हैं कि जनमत किसी भी सरकार के अच्‍छे-बुरे कार्य के आधार पर तय होता है। अखिलेश यदि कानून व्‍यवस्‍था और अन्‍य मुद्दों पर आम जनता की नजर में ठीक नहीं रहे हैं तो उनके पक्ष में वोट नहीं पड़ेगा, लेकिन यदि उनकी नीतियों से लोगों को फायदा हुआ तो जरूर वे उन्‍हें पसंद करेंगे।

इन नाकामियों पर उठ रहे होते सवाल

1- समाजवादी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की बेलगाम गुंडागर्दी और गिरती कानून व्यवस्था उनकी बड़ी नाकामी के रूप में देखी जा सकती है। याद कीजिए अखिलेश यादव के शपथ ग्रहण के दिन से ही पार्टी कार्यकर्ताओ की गुंडागर्दी शुरू हो गई थी। जवाहरबाग की घटना तो अभी हाल की ही है। 2016 के बुलंदशहर हाइवे गैंगरेप कांड जैसी कई घटनाएं अखिलेश सरकार की कानून व्‍यवस्‍था पर सवाल उठाने के लिए काफी हैं।

2- नेताओं की गुंदागर्दी की कई घटनाओं में अखिलेश सरकार ने अपने नेताओं पर कारवाई के बजाय उल्टे ही अफसरों पर गाज गिरा दी। आईपीएस अमिताभ ठाकुर और दुर्गा शक्‍ति नागपाल पर कार्रवाई इसके बड़े उदाहरण हैं। ये मामले कभी बहुत तेजी से अखिलेश सरकार के खिलाफ उठे थे लेकिन अब ठंडे बस्‍ते में हैं।

3- नौकरियों में जातिवाद की बात भी लोग शायद भूल गए हैं। एक वक्‍त था कि उत्‍तर प्रदेश में दी जाने वाली नौकरियों के चयन में एक ही जाति के लोगों के बोलबाला था। ज्‍यादातर थानेदार और पीसीएस एक ही बिरादरी के हुए और लगाए गए थे। इसे लेकर इलाहाबाद में खूब हंगामा भी हुआ था।

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4- मुजफ्फरनगर जिले के कवाल गांव में एक लड़की से छेड़छाड़ की घटना के बाद शुरू हुए जाट-मुस्लिम हिंसा में कई लोगों की जान चल गई। अगस्‍त 2013 में शुरू हुए इस दंगे के जख्‍म अब तक भरे नहीं हैं। कुछ लोग अभी कैंपों में रह रहे हैं। यह दंगा समाजवादी सरकार की बड़ी नाकामियों में से एक माना जाता है। 2016 के दादरी कांड की जिम्‍मेदारी से भी सपा अपने को अलग नहीं कर सकती।

5- सैफई के जश्‍न और यहां की सात हजार की आबादी पर हजारों करोड़ रुपये की योजनाओं के मसले पर मुलायम सिंह घिरते रहे हैं। अखिलेश यादव ने इस मसले पर खुद को अलग दिखाने की जगह उसे और बढ़ावा दिया है। कई बड़े-बड़े जिलों के बजट से ज्‍यादा रकम अखिलेश के गांव में लगाई गई है।

ये उपलब्‍धियां भी हैं अखिलेश के खाते में

अखिलेश ने अपने शासन में बेराजगारी भत्ता, कन्या विद्या धन, लैपटॉप वितरण, समाजवादी स्वास्थ्य सेवा के तहत 108 एबुलेंस सेवा, लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे निर्माण, लखनऊ में मेट्रो रेल शुरू करने और डायल 100 जैसी योजनाएं शुरू करके पिछले दाग धुलने की कोशिश की है।

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य कहते हैं कि समाजवादी पार्टी अपनी साढ़े चार साल की सरकार के माथे पर लगे कुशासन के दाग पर पर्दा डालने के लिए तरह-तरह के स्वांग रच रही है। अखिलेश को सपा अपना सबसे साफ सुथरा चेहरा बताती है जबकि अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में लगभग 500 से अधिक सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं हुई हैं। जिस अखिलेश यादव के नेतृत्व के कसीदे पढ़ते समाजवादी पार्टी नहीं थक रही है उनके कार्यकाल में बरेली, सहित कई जनपदों में बेटियों ने भयग्रस्त होकर स्कूल, कालेज जाना बंद कर दिया था।

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