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SP में रार: दोनों गुट खुद को बता रहे ‘असली’ समाजवादी पार्टी, चुनाव आयोग से मिले मुलायम

नई दिल्ली/लखनऊ। बाप-बेटे में बंट चुकी समाजवादी पार्टी के दोनों गुट साइकल चुनाव चिह्न पर अपना-अपना दावा जता रहे हैं। गेंद अब चुनाव आयोग के पाले में हैं। सोमवार को मुलायम सिंह यादव चुनाव आयोग पहुंचकर उसे सारे हालात की जानकारी दी। इस दौरान मुलायम के साथ अमर सिंह, जया प्रदा और शिवपाल यादव भी मौजूद थे। चुनाव आयोग को मुलायम ने बताया कि अखिलेश गुट के लिए गए फैसले असंवैधानिक हैं। अखिलेश गुट भी मंगलवार को चुनाव आयोग से मुलाकात करने वाला है। रामगोपाल यादव को मुलाकात के लिए चुनाव आयोग से मंगलवार सुबह 11.30 बजे का वक्त मिला है।

दोनों ही गुट एक दूसरे के फैसले को असंवैधानिक बता रहे हैं। रामगोपाल भी चुनाव आयोग से मिलकर चुनाव चिह्न साइकल पर अखिलेश गुट का दावा पेश करेंगे। सूत्रों के मुताबिक मुलायम गुट ने चुनाव आयोग के सामने यह साबित करने की कोशिश की कि 1 जनवरी को रामगोपाल द्वारा बुलाया गया पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन असंवैधानिक है, लिहाजा अधिवेशन में लिए गए फैसले भी असंवैधानिक हैं। दूसरी तरफ, मंगलवार को चुनाव आयोग में अखिलेश गुट का पक्ष रखने जा रहे रामगोपाल यादव यह साबित करने की कोशिश कर सकते हैं अधिवेशन पार्टी के संविधान के मुताबिक था और उसमें लिए गए फैसले वैध हैं।

उत्तर प्रदेश चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, अगले कुछ दिनों में चुनाव आयोग विधानसभा चुनाव के तारीखों का ऐलान कर सकता है। ऐसे में आयोग के लिए जल्द फैसला देना मुश्किल है। विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव सिर पर है, इसलिए आयोग साइकल चुनाव चिह्न को जब्त कर सकता है। दोनों गुटों को नया चुनाव चिह्न दिया जा सकता है। मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके एस.वाई. कुरैशी का भी यही मानना है कि यूपी चुनाव के बाद ही साइकल चुनाव चिह्न पर कोई फैसला लिया जा सकता है।
दोनों गुट एक दूसरे के लिए गए फैसले को पार्टी संविधान के खिलाफ बता रहे हैं। वैसे अगर समाजवादी पार्टी के संविधान की बात करें तो मुलायम सिंह यादव का पलड़ा भारी दिख रहा है। पार्टी संविधान के ऐसे कई सेक्शन हैं जो मुलायम के दावे को पुख्ता करते हैं। पार्टी के विशेष राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाने को लेकर समाजवादी पार्टी के संविधान में जो प्रावधान हैं, वह मुलायम का पक्ष मजबूत करते हैं। संविधान के मुताबिक ऐसे सम्मेलन राष्ट्रीय अध्यक्ष बुला सकते हैं या फिर राष्ट्रीय कार्यकारिणी इसे बुला सकती है बशर्ते कम से कम 40 प्रतिशत सदस्य इस पक्ष में हों। इतना ही नहीं, किसी विवाद की स्थिति में राष्ट्रीय अध्यक्ष का लिया गया फैसला ही आखिरी फैसला होगा और उसे किसी कोर्ट में चुनौती भी नहीं दिया जा सकता।

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गौरतलब है कि अखिलेश समर्थकों ने 1 जनवरी को लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क में समाजवादी पार्टी का आपातकालीन राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया था। अधिवेशन में अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पास हुआ। इसके अलावा शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने और अमर सिंह को पार्टी से बाहर करने का भी फैसला हुआ था। जवाब में मुलायम सिंह यादव ने इन फैसलों को यह कहकर असंवैधानिक बताया था कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के अलावा कोई और राष्ट्रीय अधिवेशन नहीं बुला सकता। इसके अलावा मुलायम ने रामगोपाल, किरणमय नंदा और नरेश अग्रवाल को पार्टी से बाहर निकाल दिया। दिलचस्प बात यह है कि नंदा और अग्रवाल ने खुद के निष्कासन को यह कहकर असंवैधानिक बताया है कि मुलायम को इसका अधिकार ही नहीं है क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश हैं।

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