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नेट न्यूट्रैलिटी के सपोर्ट में TRAI, FB के फ्री बेसिक्स और एयरटेल जीरो को झटका

traiनई दिल्ली। टेलिकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) ने नेट न्यूट्रैलिटी के सपोर्ट में फैसला लिया है। सोमवार को ट्राई ने कहा कि भारत में इंटरनेट डेटा के लिए डिफरेंट प्राइसिंग नहीं हो सकती। अगर नेट न्यूट्रैलिटी से जुड़े नियमों को कोई सर्विस प्रोवाइडर तोड़ता है तो उसे हर दिन 50 हजार रुपए का हर्जाना देना होगा।
अथॉरिटी ने क्या 5 बड़े एलान किए…
1. ट्राई के चेयरमैन राम सेवक शर्मा ने बताया, ‘सर्विस प्रोवाइडर अलग-अलग कंटेंट के लिए डिफरेंट टैरिफ नहीं बना सकते। इस बारे में आज नोटिफिकेशन भी जारी किया गया है जो तुरंत लागू हो गया है।’
2. ‘यदि कोई सर्विस प्रोवाइडर अलग-अलग टैरिफ लाता है, तो ट्राई उसे ट्रैरिफ वापस लेने के ऑर्डर दे सकता है। यदि कोई सर्विस प्रोवाइडर नियमों को तोड़ता है तो उसे हर दिन के 50 हजार रुपए देना होगा।’
3. ‘कोई भी सर्विस प्रोवाइडजर ऐसा कोई कॉन्ट्रैक्ट या एग्रीमेंट नहीं कर पाएगा जो भेदभाव वाले डाटा टैरिफ को प्रमोट करता हो।’
4. ‘ट्राई के नोटि‍फि‍केशन के मुताबिक, केवल इमरजेंसी सर्वि‍स या पब्लिक सर्वि‍स के लि‍ए डाटा टैरि‍फ में छूट दी जा सकती है।’
5. ‘ट्राई दो साल या उससे पहले इस नई पॉलिसी का रिव्यू कर सकता है।’
किसे होगा नुकसान ?
– रिलायंस के फ्री बेसिक्स सर्विस और एयरटेल के जीरो सर्विस को।
– इससे पहले अप्रैल 2015 में ट्राई ने डाटा सर्विस के लिए डिफरेंट प्राइसिंग के मुद्दे पर लोगों से सजेशन मांगे थे। इसके लिए अपनी वेबसाइट पर कन्सल्टेशन पेपर डाला था।
– अथॉरिटी के मुताबिक, 24 लाख लोगों ने इस पर अपने रिएक्शन दिए हैं।
क्या है फ्री बेसिक्स?
– इस सर्विस को कोई भी यूजर अपने एंड्रॉइड स्मार्टफोन पर यूज कर सकता था। यहां उसे लिमिटेड सर्विस मिलती।
– फेसबुक ने फ्री बेसिक्स या इंटरनेट डॉट ओआरजी ऑफिशियली शुरू किया था लेकिन कई एक्सपर्ट्स ने इसे नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ बताया था। इस पर बहस शुरू हो गई थी।
– विरोध के बाद फेसबुक ने internet.org को Free Basics इंटरनेट के नाम से री-ब्रांड किया।
– पहले यह सर्विस तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गोवा, आंध्र प्रदेश, गुजरात, केरल और तेलंगाना के यूजर्स के लिए लॉन्च की गई थी।
– बाद में रिलायंस ने पूरे देश के सब्सक्राइबर्स के लिए शुरू कर दिया।
– कोई भी मोबाइल यूजर्स फेसबुक की फ्री बेसिक्स ऐप के जरिए फेसबुक, न्यूज, क्रिकेट, जॉब्स, ट्रेन, फ्लाइट्स शेडयूल, हेल्थ, एस्ट्रोलॉजी, ओएलएक्स जैसी सीमित साइट्स और एप्स को फ्री में एक्सेस कर सकता था। यूजर्स को इनका इंटरनेट चार्ज भी नहीं देना पड़ता।
– फेसबुक फाउंडर मार्क जुकरबर्ग ने एक पोस्ट कहा था, “कम्युनिकेशन को बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया गया है। इससे एजुकेशन, हेल्थ और जॉब में बहुत मदद मिलेगी।”
– ट्राई के आदेश के बाद दिसंबर में रिलायंस ने फ्री बेसिक्स को होल्ड पर रख दिया था।
क्या था एयरटेल जीरो?
– इसके पहले एयरटेल ने अपने यूज़र्स के लिए ‘एयरटेल ज़ीरो’ प्लान का फ्लिपकार्ट जैसी कुछ कंपनियों के साथ करार किया था। 6 अप्रैल 2015 को इसे लॉन्च किया गया था।
– बताया गया था कि यह प्लान लेने से यूज़र्स कुछ ऐप्स का फ्री में इस्तेमाल कर पाएंगे।
– ऐसे ऐप्स का चार्ज यूज़र से न लेकर उन कंपनियों से लिया जाएगा जिनका एयरटेल से करार होगा।
– इसका इंटरनेट कम्युनिटी ने विरोध किया। अप्रैल में ही सोशल मीडिया पर विरोध के बाद फ्लिपकार्ट ने ज़ीरो प्लान से हाथ खींच लिए थे।
– 51 हजार लोगों ने फ्लिपकार्ट के ऐप की रेटिंग घटाकर 1 कर दी थी। हजारों लोगों ने ऐप ही डिलीट कर दिया था।
– क्लियरट्रिप कंपनी ने भी इंटरनेट डॉट ओआरजी से खुद को अलग कर लिया था।
– इससे एक तरह से यह स्कीम खत्म हो गई। हालांकि एयरटेल ने ऑफिशियली इससे विड्राॅ नहीं किया।
क्या है नेट न्यूट्रैलिटी?
– Net Neutrality यानी अगर आपके पास इंटरनेट प्लान है तो आप हर वेबसाइट पर हर तरह के कंटेंट को एक जैसी स्पीड के साथ एक्सेस कर सकें।
– Neutrality के मायने ये भी हैं कि चाहे आपका टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडर कोई भी हो, अाप एक जैसी ही स्पीड पर हर तरह का डेटा एक्सेस कर सकें।
– कुल मिलाकर, इंटरनेट पर ऐसी आजादी जिसमें स्पीड या एक्सेस को लेकर किसी तरह की कोई रुकावट न हो।
– Net Neutrality टर्मिनोलॉजी का इस्तेमाल सबसे पहले 2003 में हुआ। तब काेलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टिम वू ने कहा था कि इंटरनेट पर जब सरकारें और टेलिकॉम कंपनियां डाटा एक्सेस को लेकर कोई भेदभाव नहीं करेंगी, तब वह Net Neutrality कहलाएगी।
– नेट कम्युनिटी का दावा है कि अगर कंपनियों फ्री बेसिक्स जैसा मॉडल अपनातीं तो यूज़र्स को हर एक्स्ट्रा साइट या ऐप के लिए अलग चार्ज देना पड़ता या उन्हें नेट की स्पीड काफी कम मिलती।
टेलिकॉम कंपनियां क्या चाहती हैं?
-सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने ट्राई को यह दलील दी है कि भारत में कोई भी कंपनी तभी इंटरनेट टेलीफोनी सर्विस मुहैया करा सकती है जब उसे इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 के सेक्शन-4 के तहत स्पेशल लाइसेंस मिला हो।
– लिहाजा स्काइप, फेसबुक, वॉट्सऐप जैसी कंपनियां तकनीकी तौर पर बिना लाइसेंस के सर्विसेस दे रही हैं।
– टेलिकॉम कंपनियों की यह भी दलील है कि वे डाटा यूसेज से पैसा कमाती हैं, लेकिन बैंडविड्थ का उन्हें कोई पैसा नहीं मिलता। सोशल साइट्स और ई-कॉमर्स कंपनियां टेलिकॉम कंपनियों के इन्फ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन अपने रेवेन्यू में उन्हें कोई शेयर नहीं देतीं।
– हालांकि, दावा यह भी है कि बड़ी टेलिकॉम कंपनियां का डाटा सर्विसेस से रेवेन्यू पिछले साल के हर क्वार्टर में बढ़ा है। इसकी वजह यह भी है कि अगले 5 साल में 3जी और 4जी मोबाइल हैंडसेट की बिक्री बढ़ने के साथ ही डाटा यूजेज के सेगमेंट में भी जबर्दस्त उछाल आने वाला है।
TRAI ने क्या किया?
– ट्राई ने डाटा सर्विस के लिए डिफरेंट प्राइस के लिए लोगों से सजेशन मांगे थे। इसके लिए अपनी वेबसाइट पर कन्सल्टेशन पेपर डाला था।
– इसमें 20 तरह के सवालों के जवाब लोगों से मांगे गए थे। कई अवेयरनेस ग्रुप ने इन्हें सिम्प्लीफाई करने के टूल्स भी बना लिए थे।
– 6 लाख से ज्यादा लोगों ने ट्राई को नेट न्यूट्रैलिटी के फेवर में अपने जवाब भेजे थे।
पार्लियामेंट कमेटी भी कर रही है विचार
-टेलिकॉम अथॉरिटी के अलावा, पार्लियामेंट कमेटी भी नेट न्यूट्रैलिटी की सिफारिशों को अंतिम रूप दे रही है।
– उधर, टेलिकॉम मिनिस्ट्री की हाई लेवल कमेटी ने भी internet.org जैसे प्लैटफॉर्म का विरोध किया था।
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