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रावण के थे दो ‘वानर’- एक शुक, दूजा सारण: श्रीराम की सेना में घुस गए, कौन से राज़ पता लगाने थे?

अनुपम कुमार सिंह

रावण को विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई व्यक्ति समुद्र पर भी पुल बाँध सकता है। ‘आम आदमी पार्टी (AAP)’ के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल मौलवियों को वेतन देने के लिए जाने जाते हैं और समय-समय पर बाबरी मस्जिद के लिए उनकी पार्टी अपना प्रेम भी दिखा चुकी है। दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और AAP के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय सिंह राम मंदिर के दर्शन के लिए अयोध्या गए। इस घटना का ‘शुक और सारण’ से कोई लेनादेना नहीं है।

आइए, हम शुक और सारण की कहानी को याद करते हैं। महर्षि वाल्मीकि ‘रामायण’ में लिखते हैं कि रावण को यकीन नहीं हो रहा था कि समुद्र पर पुल बाँध दिया गया होगा। साथ ही उसे वानर सेना की शक्ति व संख्या का एक आकलन भी चाहिए था। अतः, उसने शुक और सारण नाम के अपने दो गुप्तचरों को बुला कर कहा, “तुम दोनों श्रीराम की वानर सेना में कुछ इस तरह प्रवेश करो कि कोई तुम्हें पहचान नहीं पाए।”

रावण ने उन्हें आदेश दिया, “तुम जाकर पता लगाओ कि वानर सेना की संख्या कितनी है। उनकी शक्ति कितनी है। कौन-कौन से मुख्य वानर हैं। श्रीराम और सुग्रीव के चहेते मंत्री कौन-कौन से हैं। वानरों की छावनी से लेकर समुद्र पर पुल कैसे बाँधा गया और कौन-कौन से योद्धा आगे रहते हैं, ये सब पता लगाओ। श्रीराम और वीर लक्ष्मण का निश्चय क्या है? वो क्या करना चाहते हैं। उनके बल व पराक्रम कैसे हैं?”

रावण ने आगे उन्हें ये पता लगाने का भी आदेश दिया कि श्रीराम व लक्ष्मण के पास किस-किस किस्म के अस्त्र-शस्त्र हैं और वानरों का सेनापति कौन है। सारे यथार्थ का ज्ञान कर के रावण ने शुक और सारण को अतिशीघ्र वापस आने का आदेश दिया। ये अलग बात है कि वहाँ जाकर ये दोनों छिप नहीं पाए और पकड़े गए। वो तो भला हो श्रीराम की दयालुता का कि उन्होंने इन दोनों को बिना नुकसान पहुँचाए वापस जाने दिया।

असल में उस समय श्रीराम की छावनी में रह रहे रावण के भाई विभीषण ने उन दोनों को पहचान लिया था। उन्होंने श्रीराम को बता दिया कि ये दोनों राक्षस गुप्तचर शुक और सारण हैं। दोनों श्रीराम को देखते ही डर गए और उन्हें जा की चिंता सताने लगी, इसीलिए उन्होंने सब कुछ सच-सच उगल दिया। श्रीराम ने हँसते हुए उनसे कहा कि तुम आराम से सब कुछ पता लगा लो और जो न पता लगा सको, विभीषण तुम्हें सब बता देंगे।

फिर उन्होंने कहा कि सब पता कर के प्रसन्नतापूर्वक तुम लौट जाओ। वो तो त्रेता युग था। अब कलियुग है। यहाँ कुछ ऐसा हो रहा है, जिसका इस कहानी से कोई लेनादेना नहीं। ‘हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ कहने वाले संजय सिंह भगवा गमछा ओढ़ कर और राम मंदिर की जगह स्कूल-कॉलेज बनाने की बात करने वाले मनीष सिसोदिया रामनामी गमछा पहन कर अयोध्या में प्रविष्ट हुए हैं, अरविंद केजरीवाल के आदेश से।

अब जमाना शुक और सारण का नहीं रहा। ये राजनीति का युग है। जमाना सिसोदिया और सिंह का है। मनीष और संजय का है। रावण का नहीं, अरविंद और केजरीवाल का है। सेना से सबूत माँगने का है। जनता द्वारा सबक सिखाए जाने पर अगली बार सबसे पहले सेना को बधाई देने का भी है। जमाना विभीषण का नहीं, कुमार विश्वास का है। दोनों दो अलग-अलग युग हैं। उनमें कोई मेल नहीं। या… है? या नहीं भी हो सकता है?

आज का रावण भी हनुमान जी से डरता है। हाँ, वो कभी-कभी पूजा-पाठ भी करता है। रावण भी भगवान शिव की आराधना किया करता था। आज का रावण भी बहुरूपियों को पालता है। आज का रावण खुद बहुरूपिया है। जमाना भले ही बदल गया हो, लेकिन आज का रावण अपनी लंका को जलते हुए न सही तो पानी में डूबते हुए तो देखता ही रहता है। आज का रावण राम लक्ष्मण तो नहीं, मोदी और योगी से ज़रूर डरता है।

सभार…………

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